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देवहुति पूछती हैं- सच्चा सुख और आनंद कहां है, उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
भगवान कपिल ने कहा- माता किसी जड़ वस्तु में आनंद हो ही नहीं सकता. आनंद तो आत्मास्वरूप है. सांसारिक विषय सुख दे सकते हैं पर आनंद नहीं. जो सुख का कारण बनेगा वही दुख का कारण भी बनेगा पर परमात्मा हमेशा आनंद ही देंगे. इसलिए आनंद परमात्मा का स्वरूप है.
भगवान कपिल की बात को सरल शब्दों में समझिए. सांसारिक सुख तो शरीर की खुजली जैसे हैं, आप जब तक खुजाएंगे तब तक आनंद मिलेगा पर नाखून में भरा विष धीरे-धीरे खुजली में भरता जाएगा, जहर शरीर में फैल जाएगा. खुजली का रोग पूरे शरीर में फैल जाएगा.
सर्वोत्तम मिठाई का स्वाद भी केवल जिह्वा तक ही रहता है. जगत के पदार्थों में आनंद नहीं है, बस मिथ्या आनंद का आभास मात्र है. तो फिर आनंद है क्या? अर्जुन ने यही प्रश्न भगवान से किया था.
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- विषयों और इंद्रियों के संयोग से जो सुख उत्पन्न होता है वह आरंभ यानी भोगकाल में अमृत के समान सुख देने वाला लगता है किंतु उसका परिणाम विष के समान होता है. इसे ही राजस सुख कहते हैं.
आप खुद सोचिए, मदिरा और फलों के रस की दुकाने आसपास ही दिख जाएंगी. यदि संतरे के रस में उसका एक बीज गलती से पिस जाए तो उसकी कड़वाहट स्पष्ट हो जाती है और पीने वाला उस रस को बेस्वादु बताकर भला-बुरा कह जाता है.
वही व्यक्ति उसके बाद शराब की दुकान में जाता है. वह शराब पूरी तरह कड़वी होती है. जिह्वा के पास ले जाते समय वह बुरा मुंह तो बनाता है लेकिन फिर भी पीता जाता है. उसे गटकने के लिए और कई ऐसी चीजों सहारा लेता है जो बेस्वादु हैं.
फल के रस और शराब की प्रकृति अलग है. यदि शराब मिठी लगने लगे तो उसे पीने वाला पसंद नहीं करेगा और रस कड़वा लगे तो नहीं निगल पाएगा.
फल यदि कड़वा है तो भी वह शरीर का भला ही करेगा यह बात जानते हुए भी हम उसके कड़वेपन के लिए कड़वी बातें कह जाते हैं जबकि शराब का परिणाम जानते हुए भी उसकी कड़वाहट को शरीर में भरते जाते हैं.
मिथ्या में ही आकर्षण होता है. सत्य तो अप्रिय लगेगा ही. आनंद को अगर तलाश सकते हैं तो प्रभु के नाम में तलाशिए.
जो व्यक्ति भागवत को समझ ले उसे दिव्य दृष्टि मिल जाती है.
दिव्यदृष्टि का मतलब यह नहीं है कि वह हजारों मील दूर की चीजों को संजय की तरह आंख बंदकर देखने लगे बल्कि जीवन है क्या, हम जन्म क्यों लेते हैं, क्यों मृत्यु आवश्यक है, इन बातों का ज्ञान हो जाता है. यही दिव्यदृष्टि है.
मोक्ष का अर्थ केवल यह नहीं कि जीवन त्यागने के बाद एक सुंदर संसार में प्रवेश कर जाएं और पुनः मृत्युलोक में न आना पड़े. जीवनकाल में बहुत सी ऐसी बातें हैं जो ईश्वर ने हमें बताई हैं जिन्हें हम समझकर उस पर अमल कर लें तो जीवनकाल में मोक्ष का आनंद मिल सकता है. भागवतमहापुराण में यह मर्म बहुत सुंदर और सरल रूप में बताया गया है.
हिंदू धर्मग्रंथों में से खासकर पुराणों में बातें प्रतीक रूप में कही गई हैं. वेद व्यासजी ने सोचा होगा कि समय के साथ मनुष्य की बुद्धि और तीव्र होती जाएगी. एक समय ऐसा आएगा कि बोलने की आवश्यकता ही न रहेगी, बस संकेत मात्र से मनुष्य बात करने लगेगा इसलिए ऐसे ग्रंथों की रचना हुई जिसमें प्रतीक रूप में बात की जाए. पर ऐसा हुआ नहीं.
हमारी बुद्धि इतनी भटकती चली गई कि हम अर्थ का अनर्थ करने लगे. जो प्रत्यक्ष है उसे ही नहीं समझ पाते तो संकेत को कहां से समझेंगे. इसी कारण आजकल ज्यादातर लोग पुराणों आदि का उपहास कर रहे हैं. ये वहीं लोग हैं जो संकेत और प्रतीक को समझ नहीं पाते या समझने का प्रयास नहीं करते. जिन्होंने विज्ञान और ज्ञान दोनों लिया है वे इन पर शंका नहीं करते.
आपको तय करना होगा कि अपने ग्रंथों का आप उपहास करेंगे या फिर प्रयास करेंगे समझने का कि आखिर इसमें कहा क्या गया है. यदि प्रयास करना है तो प्रभु शरणम् से जुड़ जाइए. निःशुल्क ज्ञानचर्चा है.
-राजन प्रकाश
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Mujha bhut khusi h ki Jo hmari sanskriti hmara ved puran lupt hota ja RHA h aur Jo hmara snatan dharm k h vo bhi apna dharmik grantho PR dhyan nhi d rhe h. Kintu Prabhusarnam app k nirmata aur unki sari team ka shraho.ya s dhnyabad deta hu. Aur prabhu s kamna krta hu ki aaga aur future m bhi dino din trakki kra. Jay ho.