हरितालिका, हरियाली, कजरी 3 तीज में अंतरः हरतालिका तीज की संपूर्ण विधि, व्रत कथा
देवी पार्वती और भगवान शिव को समर्पित आस्था का पर्व तीज
सनातन परंपरा में तीज का पर्व केवल एक व्रत नहीं, अपितु देवाधिदेव महादेव और मां पार्वती के अखंड प्रेम, कठिन साधना और सुहाग की अमरता का उत्सव है। अक्सर श्रद्धालु भक्तजनों के मन में यह संशय रहता है कि वर्ष भर में आने वाली तीनों तीज में क्या भेद है और इनका वास्तविक माहात्म्य क्या है।
हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज: तीनों के अंतर को समझें

हालांकि तीनों ही तीज शिव-शक्ति की उपासना और अखंड सौभाग्य की कामना से जुड़ी हैं, किंतु इनके मास, पूजन विधान और आध्यात्मिक भाव में बड़ा अंतर है। आइए, इसे सरल शब्दों में समझें ताकि कोई भ्रम न रहे।
1. हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया)
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मास व तिथि: श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। लोकभाषा में इसे ‘छोटी तीज’ अथवा ‘श्रावणी तीज’ भी कहते हैं।
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कथा व आध्यात्मिक भाव: यह पर्व शिव-पार्वती के पुनर्मिलन और प्रकृति के उल्लास का प्रतीक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहते हैं कि मां पार्वती को 107 जन्मों की कठिन तपस्या के बाद शिव जी पति रूप में मिले थे। देवी पार्वती के तप से प्रसन्न होकर उनके 108वें जन्म में इसी पावन तिथि पर महादेव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था।
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पूजन व परंपरा: यह प्रकृति के सौंदर्य, उमंग और सुहाग का पर्व है। इस दिन महिलाएं हरे रंग के वस्त्र और हरी चूड़ियां धारण कर सोलह श्रृंगार करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और झूले झूलती हैं। भगवान शिव और माता पार्वती को घेवर, मालपुआ व मौसमी फलों का भोग लगाकर दांपत्य सुख की प्रार्थना की जाती है।
2. कजरी तीज / सातुड़ी तीज (भाद्रपद कृष्ण तृतीया)
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मास व तिथि: हरियाली तीज के ठीक पंद्रह दिन बाद, भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को कजरी तीज मनाई जाती है। इसे ‘कजली तीज’, ‘बूढ़ी तीज’ या ‘सातुड़ी तीज’ भी कहा जाता है।
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कथा व आध्यात्मिक भाव: ‘कजरी’ का संबंध भादों के कजरारे मेघों और विरह-गीतों से है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह पर्व विरह के बाद प्रभु मिलन की प्रतीक्षा, धैर्य और अनन्य निष्ठा का प्रतीक है।
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पूजन व परंपरा: राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत में इस पर्व की विशेष मान्यता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और घर में कच्ची मिट्टी या दीवार पर नीमड़ी माता की स्थापना करती हैं। शाम को गाय के कच्चे दूध और जल से नीमड़ी माता को अर्घ्य दिया जाता है। रात्रि में चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर सत्तू (सातू) से व्रत खोला जाता है।
3. हरतालिका तीज (भाद्रपद शुक्ल तृतीया)
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मास व तिथि: यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है, जो श्रीगणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पूर्व आती है। इसे ‘बड़ी तीज’ या ‘हरितालिका’ कहा जाता है।
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कथा व आध्यात्मिक भाव: ‘हरत’ अर्थात हरण और ‘आलिका’ अर्थात सखी। जब पिता हिमवान माता पार्वती का विवाह श्रीहरि विष्णु से करना चाहते थे, तब माता के मन की व्यथा समझकर उनकी सखियां उनका हरण कर घोर वन में ले गईं। वहां माता ने रेत का शिवलिंग बनाकर कठोर निर्जला तप किया और महादेव को प्राप्त किया। यह पर्व संकल्प, सखी के निस्वार्थ सहयोग और अटल पतिव्रत धर्म का महापर्व है।
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पूजन व परंपरा: यह तीनों तीजों में सबसे कठिन महाव्रत माना गया है। इसमें पूर्णतः निर्जला उपवास रखा जाता है। प्रदोष काल में शुद्ध मिट्टी या बालू से भगवान शिव, माता पार्वती, गणेशजी और सखी की प्रतिमा बनाकर षोडशोपचार पूजन किया जाता है। रात्रि भर चार प्रहर की पूजा, जागरण और शिव-पार्वती स्तुति होती है। अगले दिन सुबह प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद ही पारण का विधान है।
संक्षेप में स्मरण रखें:
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हरियाली तीज: पुनर्मिलन, प्रकृति के सौंदर्य और श्रृंगार व उल्लास का उत्सव है।
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कजरी तीज: विरह के बाद प्रभु-मिलन के धैर्य, समर्पण और नीमड़ी पूजन का व्रत है।
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हरतालिका तीज: कठोर तपस्या, अटल प्रतिज्ञा और अखंड सौभाग्य के महासंकल्प का दिन है।
अब तक आपने समझ लिया कि इनमें से हरितालिका या हरतालिका तीज सबसे कठिन व्रत है। यह दिन पूरी तरह से शिव-पार्वती की उपासना को समर्पित रहता है। अन्य दोनों तीज में प्रकृति के सौंदर्य, शृंगार, उल्लास, विरह के बाद भगवान से मिलन के धैर्य का उत्सव मनाया जाता है।
आइए, अब हरतालिका तीज व्रत की संपूर्ण पूजा विधि, नियम, सामग्री और पावन व्रत कथा को विस्तार से जानें।
हरतालिका तीज व्रत की पूजा विधि

माता पार्वती ने कठिन तपस्या के बल पर देवाधिदेव महादेव को पति रूप में प्राप्त किया था। किसी भी स्त्री के लिए सुहाग उसकी सबसे बड़ी पूंजी है, इसलिए इस व्रत को पूर्ण निष्ठा और पवित्रता से किया जाता है:
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पूर्व तैयारी: व्रत से एक दिन पहले महिलाएं हाथों में मेहंदी रचाती हैं और पूजन की तैयारी करती हैं।
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व्रत संकल्प: तृतीया के दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव-पार्वती का ध्यान करते हुए निर्जला व्रत का संकल्प लें।
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पूजन का शुभ समय: हरतालिका तीज की मुख्य पूजा प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय और उसके बाद की बेला) में की जाती है।
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मंडप व वेदी निर्माण: घर के स्वच्छ व पवित्र स्थान पर तोरण-मंडप सजाएं। एक चौकी या पीढ़े पर केले के पत्ते बिछाएं।
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प्रतिमा निर्माण: शुद्ध मिट्टी या बालू में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, माता पार्वती, उनकी सखी, भगवान गणेशजी और रिद्धि-सिद्धि की प्रतिमाएं अपने हाथों से बनाएं।
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प्रतिमा बनाते समय मंत्र स्मरण:
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शिवजी की प्रतिमा बनाते समय: ऊं नमः शिवाय
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पार्वतीजी की प्रतिमा बनाते समय: ऊं साम्ब शिवाय नमः या ऊं उमायै नमः
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गणेशजी की प्रतिमा बनाते समय: ऊं गं गणपतये नमः अथवा ऊं गौरीपुत्राय नमः
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षोडशोपचार पूजन: प्रतिमाओं की स्थापना के उपरांत सभी देवी-देवताओं का आह्वान करें और षोडशोपचार (16 प्रकार के उपचारों) से पूजन करें। षोडशोपचार पूजन अत्यंत सरल है—इसमें पंचामृत स्नान, वस्त्र, गंध, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और तांबूल आदि प्रेमपूर्वक अर्पित किए जाते हैं। (सरल षोडशोपचार पूजन विधि के लिए प्रभु शरणम् एप्प का ‘पूजन विधि’ अनुभाग देख सकते हैं)।
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रात्रि जागरण व चार प्रहर पूजा: इस व्रत में रात्रि जागरण का विशेष माहात्म्य है क्योंकि विवाह का लग्न रात्रिकाल में ही होता है। यदि संभव हो तो रात्रि के चारों प्रहर में भगवान शिव को बिल्वपत्र, शमीपत्र, धतूरा और ऋतुफल अर्पित कर आरती व भजन-कीर्तन करें। यदि स्वास्थ्य कारणों से पूरी रात जागना संभव न हो, तो जब तक जगे रहें, प्रभु के ध्यान में लीन रहें।
पूजन में जपे जाने वाले कल्याणकारी मंत्र
माता पार्वती की स्तुति के लिए मंत्र:
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ऊं उमायै नमः
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ऊं पार्वत्यै नमः
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ऊं जगद्धात्र्यै नमः
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ऊं जगत्प्रतिष्ठायै नमः
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ऊं शांतिरूपिण्यै नमः
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ऊं शिवायै नमः
भगवान शिव की आराधना के लिए मंत्र:
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ऊं हराय नमः
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ऊं महेश्वराय नमः
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ऊं शम्भवे नमः
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ऊं शूलपाणये नमः
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ऊं पिनाकवृषे नमः
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ऊं शिवाय नमः
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ऊं पशुपतये नमः
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ऊं महादेवाय नमः
जैसी मनोकामना वैसी गणेशजी की प्रतिमा की करें आराधना
हरतालिका तीज व्रत के प्रमुख नियम
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निर्जला उपवास: यह व्रत पूर्णतः निर्जला रखा जाता है। पूरे दिन और रात अगले सूर्योदय तक जल और अन्न ग्रहण नहीं किया जाता।
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नियमबद्धता: मान्यता है कि यह व्रत एक बार प्रारंभ करने के बाद प्रतिवर्ष पूरी श्रद्धा से निभाया जाता है।
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श्रृंगार व वस्त्र: तीज के दिन नए वस्त्र और सोलह श्रृंगार धारण करके ही पूजा में बैठना चाहिए।
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विशेष परिस्थितियों में छूट: जो महिलाएं अस्वस्थ हैं, गर्भवती हैं, धात्री माताएं हैं या किसी गंभीर रोग से पीड़ित हैं, उनके लिए शास्त्रों में फलाहार या सात्विक आहार ग्रहण करने की अनुमति है। यदि दवा लेना अनिवार्य हो, तो भगवान शिव-पार्वती से क्षमा-प्रार्थना कर औषधि ग्रहण कर सकती हैं। प्रभु भाव के भूखे हैं, कष्ट के नहीं।
हरतालिका तीज की पूजन सामग्री
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प्रतिमा व मंडप हेतु: बालू रेत या शुद्ध काली मिट्टी, केले के पत्ते, मंडप सजाने हेतु फूल-पत्ते।
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शिव पूजन सामग्री: बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा, आंकड़े के फूल, जनेऊ, सफेद वस्त्र, भस्म, भांग, गंगाजल।
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माता पार्वती का सुहाग पिटारा: लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, कुमकुम, मेहंदी, चूड़ियां, बिछिया, काजल, कंघी, महावर, इत्र व सोलह श्रृंगार की सामग्री।
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हवन व आरती सामग्री: गाय का घी, दीपक, कर्पूर, धूप, अगरबत्ती, अक्षत (अखंडित चावल), सुपारी, लौंग, इलायची, नारियल, कलश और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शर्करा)।

हरतालिका तीज व्रत कथा
हरतालिका तीज के पावन माहात्म्य की कथा स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पूर्वजन्म के तप का स्मरण कराने के उद्देश्य से सुनाई थी।
भगवान शिव बोले— हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर गंगा के पावन तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था। तुमने वर्षों तक केवल वायु का सेवन किया, सूखे पत्ते चबाकर साधना की। माघ की कड़ाके की ठंड में तुम शीतल जल में खड़ी रहीं, वैशाख की प्रचंड धूप में पंचाग्नि तप किया और श्रावण की मूसलाधार वर्षा में खुले आकाश के नीचे निराहार तप करती रहीं।
तुम्हारी इस कठोर तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता पर्वतराज हिमवान अत्यंत चिंतित और दुःखी रहते थे। तभी एक दिन देवर्षि नारद तुम्हारे घर पधारे। गिरिराज द्वारा आने का कारण पूछने पर नारदजी बोले— “हे पर्वतराज! मैं भगवान श्रीहरि विष्णु के कहने पर यहां आया हूँ। आपकी पुत्री के घोर तप से प्रसन्न होकर वे उनसे विवाह करना चाहते हैं।”
नारदजी की बात सुनकर पर्वतराज अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले— “यदि साक्षात वैकुंठपति मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा!” तुम्हारे पिता की सहमति लेकर नारदजी लौट गए। किंतु जब तुम्हें इस विवाह की सूचना मिली, तो तुम्हारे दुःख का ठिकाना न रहा।
तुम्हें अत्यंत व्याकुल देखकर तुम्हारी एक प्रिय सखी ने कारण पूछा। तुमने रोते हुए कहा— “मैंने अपने अंतःकरण से देवाधिदेव महादेव को पति रूप में वरण किया है, किंतु मेरे पिता मेरा विवाह श्रीहरि से कराना चाहते हैं। अब प्राण त्यागने के अतिरिक्त मेरे पास कोई मार्ग नहीं बचा।”
तुम्हारी सखी अत्यंत विवेकशील थी। उसने कहा— “हे सखी! प्राण त्यागने से क्या लाभ? संकट में धैर्य ही धर्म है। नारी का धर्म है कि जिसे मन से एक बार वरण कर ले, जीवन भर उसी निष्ठा पर अडिग रहे। मैं तुम्हें एक ऐसे घने और दुर्गम वन में ले चलती हूँ, जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज नहीं पाएंगे। वहां तुम अपने आराध्य की साधना करो।”
माता पार्वती अपनी सखी के साथ वन में चली गईं। उधर पर्वतराज हिमवान कन्या को न पाकर अत्यंत व्याकुल हुए और चारों दिशाओं में खोज शुरू करवाई। इधर माता पार्वती ने नदी तट की एक गुफा में रेत के शिवलिंग की स्थापना की और निराहार व निर्जल रहकर रात्रि भर स्तुति व जागरण किया।
माता पार्वती की इस अनन्य और कठोर तपस्या के प्रभाव से महादेव का आसन डोल उठा। भगवान शिव साक्षात प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। माता पार्वती ने करबद्ध होकर कहा— “हे प्रभु! मैंने सच्चे हृदय से आपको ही पति रूप में स्वीकार किया है। यदि आप मेरी तपस्या से संतुष्ट हैं, तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करें।” महादेव ने ‘तथास्तु’ कहा और अंतर्धान हो गए।
प्रातःकाल माता पार्वती ने अपनी सखी सहित पूजा सामग्री का विसर्जन किया। उसी समय गिरिराज हिमवान अपने बंधु-बांधवों सहित वहां पहुंचे। माता ने पिता से स्पष्ट कहा— “पिताजी! मैंने महादेव की प्राप्ति के लिए यह तप किया था और उन्होंने मुझे स्वीकार कर लिया है। मैं घर तभी चलूंगी जब आप मेरा विवाह शिवजी से कराएंगे।” पर्वतराज सहमत हो गए और उन्होंने विधि-विधान से शिव-पार्वती का विवाह संपन्न कराया।
भगवान शिव ने कहा— “हे पार्वती! तुम्हारी सखी द्वारा तुम्हारा हरण करके वन में ले जाने और वहां तुम्हारे द्वारा किए गए इस कठोर व्रत के कारण ही इसका नाम हरतालिका तीज पड़ा। जो भी स्त्री इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और नियम से करती है, उसे तुम्हारी ही भांति अखंड सुहाग और गृहस्थ सुख की प्राप्ति होती है।”
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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