January 28, 2026

हरतालिका तीज व्रतः तिथि, मुहूर्त, संपूर्ण विधि व व्रत कथा

शिव परिवार- शिव-पार्वती कृपा से उत्तम संतान

हरतालिका तीज महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है. तीज सावन शुक्लपक्ष की तृतीया को भी मनाया जाता है. उसे हरियाली तीज कहते हैं. भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाने वाली तीज हरतालिका तीज कहलाती है.

सुहागिनों और कहीं-कहीं कुंआरी कन्याओं द्वारा अच्छे दांपत्य जीवन की कामना से किया जाने वाला त्योहार है तीज. शास्त्रों में विधवा स्त्रियों को भी हरतालिका तीज व्रत किए जाने की अनुमति है. विधि-विधान से हरतालिका तीज व्रत रखके शिव-पार्वती पूजन से अखंड सुहाग का वरदान मिलता है.

शिव परिवार- शिव-पार्वती कृपा से उत्तम संतान

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इस पोस्ट में आप हरतालिका तीज व्रत की सरल पूजा विधि, हरतालिक तीज व्रतकथा, व्रत की सामग्री, मंत्र आदि जानेंगे. हरतालिका तीज को दिन भर जपे जाने वाले कुछ सरल मंत्र भी बताएंगे. उनके जप से आपके हरितालिका व्रत का फल कई गुना बढ़ जाएगा.

कुल मिलाकर आप यह समझ लें कि पोस्ट पढ़ने के बाद आप तीज व्रत की पूजा खुद तो कर ही सकते हैं दूसरों की पूजा में हेल्प भी कर सकते हैं. तीज व्रत की चर्चा आगे बढ़ाने से पहले यह समझ लें कि तीज मनाई क्यों जाती है?

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हरतालिका तीज व्रत की पूजा कैसे करेंः

कहते हैं, पार्वतीजी ने शिवजी को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए 107 जन्म लिए और शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तप करती रहीं. 108वें जन्म में शिवजी उन्हें प्राप्त हुए. किसी स्त्री के लिए उसकी सबसे बड़ी पूंजी है उसका सुहाग. अखंड सौभाग्य की कामना से स्त्रियां तीज व्रत करती हैं. माता पार्वती ने कठिन व्रत से शिवजी जैसा उत्तम पति प्राप्त किया था.

  • तीज की पूजा को पूरे विधि-विधान से किया जाता है. एक दिन पहले मेहंदी सजाई जाती है.
  • व्रत के दिन महिलाएं निर्जल रहकर व्रत रखती हैं.
  • हरतालिका की पूजा प्रदोष काल यानी जब सूर्यास्त हुआ हो तब करना चाहिए.
  • पूजा के लिए मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की मूर्ति बनाकर पूजन किया जाता है.
  • साफ-स्वच्छ स्थान पर तोरण-मंडप आदि बनाएं.
  • एक लकड़ी की चौकी या पीढ़े पर शुद्ध मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, पार्वतीजी, उनकी सखी, गणेशजी और रिद्धि-सिद्धि की प्रतिमा बनाएं. पार्वतीजी की सखी की प्रतिमा क्यों बनाते हैं, यह बात तीज व्रत की कथा में आगे जानेंगे.
  • प्रतिमाएं बनाते समय उन भगवान का स्मरण करें जिनकी प्रतिमा बना रहे हैं. भगवान का स्मरण उनके किसी भी मंत्र से कर सकते हैं या मंत्र याद नहीं है तो उनका ध्यान करके उनका आदर से नाम लेते रहें तो भी पर्याप्त है.
  • शिवजी की प्रतिमा बनाते समय ऊं नमः शिवाय का स्मरण करते रहें.
  • पार्वतीजी की प्रतिमा बनाते समय ऊं साम्ब शिवाय नमःमंत्र का स्मरण करते रहें.
  • गणेशजी की प्रतिमा बनाते समय ऊं गं गणपत्ये नमः या ऊं गौरीपुत्राय नमः का स्मरण करते रहें.
  • प्रतिमाएं बन जाएं तो फिर देवताओं का आह्वान करें. उसके बाद षोडशोपचार यानी सोलह प्रकार के पूजन करें. सोलह प्रकार के पूजन शब्द से घबराएं नहीं. यह पूजन बहुत सरल हैं. इनके मंत्र भी बहुत सरल हैं. आप Prabhu Sharnam ऐप्पस डाउनलोड कर लें. उसके व्रत-पूजा मंत्र सेक्शन में इसकी ऐसी सरल विधि बताई गई है जिसे कोई भी स्वयं कर सकता है.  यहां लिंक दे रहे हैं. जब पूजा कर ही रहे हैं तो विधिवत कर लेनी चाहिए. व्रत रखा है तो पांच मिनट की पूजा से क्या पीछे हटना. बहुत सरल तरीके से समझाया गया है. प्रभु शरणम् ऐप्प में देखें- पूजन विधि सेक्शन- षोडशोपचार पूजन विधि

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  • सोलह प्रकार की सामग्री भी बहुत आसानी से मिलने वाली है जैसे पंचामृत, गंगाजल, कुमकुम आदि. पूजा में क्या-क्या सामग्री चाहिए यह सब आगे बताया गया है. कृपया पढ़ते रहें.
  • तीज का पूजन वैसे तो रात्रि भर चलता है. इस दौरान महिलाएं जागरण करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन भी करती हैं किंतु यदि स्वास्थ्य कारणों या किसी कारण से रात्रि जागरण न भी कर पाएं तो कोई चिंता की बात नहीं.
  • पूजा का सबसे अच्छा समय संध्याकाल ही होता है. पूजा करते समय पार्वतीजी और शिवजी के कुछ और सरल मंत्र हैं उनका भी उच्चारण करना चाहिए. अब आपने दिनभर इतना कठिन व्रत रखा है तो पूजा भी विधिवत ही होनी चाहिए जो कि बहुत आसान है.
  • आप दिनभर व्रत के दौरान इन मंत्रों का स्मरण करते रहिए. संभव हो तो माला से जप करें नहीं तो ऐसे भी कोई भी मंत्र जपते रहें.
  • यदि रात्रि जागरण कर रही हैं तो प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को बिल्व-पत्र, आम पल्लव आदि अर्पण किया जाता है. रात्रि जागरण नहीं भी हो पा रहा तो भी जितने प्रहर तक जाग रहे हैं शिव-पार्वतीजी की आराधना मंत्र-आरती और स्तोत्र द्वारा करनी चाहिए. रात्रि जागरण इस व्रत में इसलिए कहा गया है क्योंकि विवाह रात्रिकाल में ही होता है. जागरण नहीं कर पा रहे तो चिंतित होने की आवश्यकता नहीं. जब तक जागे हैं प्रभु में ध्यान लगा रहे.
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तीज व्रत पर माता पार्वती की प्रार्थना निम्न मंत्रों से कर सकते हैं-
ऊँ उमायै नम:,
ऊँ पार्वत्यै नम:,
ऊँ जगतधात्रये नम:,
ऊँ जगत्प्रतिष्ठायै नम:,
ऊँ शांतिरूपिण्यै नम:,
ऊँ शिवायै नम:

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तीज पर भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करें-

ऊँ हराय नम:,
ऊँ महेश्वराय नम:,
ऊँ शम्भवे नम:,
ऊँ शूलपाणये नम:,
ऊँ पिनाकवृषे नम:,
ऊँ शिवाय नम:,
ऊँ पशुपतये नम:,
ऊँ महादेवाय नम:

पूजन दूसरे दिन सुबह समाप्त होता है तब महिलाएं अपना व्रत तोड़ती हैं और अन्न ग्रहण करती हैं.

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हरतालिका तीज व्रत के नियम :

  • व्रत निर्जला किया जाता हैं अर्थात पूरा दिन एवं रात अगले सूर्योदय तक जल ग्रहण नहीं किया जाता.
  • व्रत कुंआरी कन्याओं, सुहागिनों द्वारा किया जाता हैं. विधवा महिलाओं को भी इस व्रत के करने से मनाही नहीं है. कई स्थानों में विधवाएं भी अगले जन्म में अखंड सौभाग्य प्राप्ति के लिए यह व्रत करती हैं.
  • व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता. इसे प्रति वर्ष पूरे नियमों के साथ किया जाता हैं.
  • इस दिन स्त्रियों के मायके से श्रृंगार का सामान तथा मिठाइयां ससुराल में भेजी जाती है. तीज के दिन महिलाएं प्रातः गृह कार्य व स्नान आदि के बाद सोलह श्रृंगार कर निर्जला व्रत रखती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं.
  • नये वस्त्र पहनकर पूरा श्रृंगार करके व्रत किया जाता है.
  • व्रत से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित हैं. कहते हैं इस व्रत के दौरान जो सोती हैं वे अगले जन्म में अजगर बनती हैं, जो दूध पीती हैं वे सर्पिनी, जो व्रत नहीं करती वे विधवा, जो शक्कर खाती हैं वे मक्खी बनती हैं.
  • जो मांस खाती हैं वे गिद्ध, जो जल पीती हैं वे मछली और जो अन्न खाती हैं वे सुअरी और जो फल खाती हैं वे बकरी बनती हैं.
  • अस्वस्थ हैं, गर्भवती हैं, प्रसूता हैं या किसी विशेष प्रयोजन के कारण भोजन करना अनिवार्य है तो ऐसी स्त्रियों के लिए सात्विक भोजन और फलाहार की अनुमति है.
  • यदि दवाई आदि खाना एकदम अनिवार्य है तो उसके लिए भी भगवान शिव-पार्वती का स्मरण करें, उन्हें विवशता बताएं और फिर दवाई खा लें. इसके लिए मनाही नहीं है. यह भी विशेष प्रयोजन में आता है.

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हरतालिका तीज की पूजन सामग्री व पूजा की विधिः

विभिन्न फूलों की माला, काली मिट्टी अथवा बालू रेत, मंडप बनाने के लिए, केले का पत्ता, मौसमी फल एवं फूल पत्ते, बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे, आंकड़े का फूल, तुलसी, मंजरी, शिवजी को अर्पित करने वाले जनेऊ, वस्त्र.

माता गौरी को चढ़ाने के लिए सुहाग का पूरा सामान जिसमें चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, माहौर, मेहंदी, सुगंध आदि शृंगार की सभी सामग्री जो महिलाएं प्रयोग करती हैं.

गणेशजी एवं अन्य देवों को अर्पित करने के लिए घी, तेल, दीपक, कर्पूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश. पंचामृत के लिए घी, दही, शक्कर, दूध, शहद. हरतालिका पूजन प्रदोष काल अर्थात दिन और रात के मिलने के समय किया जाता है.

यदि कोई सामग्री उपलब्ध नहीं हो सकी तो चिंता न करें. जो सामग्री उपलब्ध है उसी से पूजन किया जा सकता है.

पूजन के लिए शिव, पार्वती एवं गणेशजी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से हाथों से बनाई जाती हैं.

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जैसे विवाह के लिए मंडप सजता है वैसे ही मंडप सजाएं. उसके भीतर रंगोली डालकर चौकी पर पहले केले के पत्ते को रखते हैं.

तीनों प्रतिमाओं को केले के पत्ते पर आसीन करें.

सर्वप्रथम कलश के उपर नारियल अथवा एक दीपक जलाकर रखें. घड़े के मुंह पर लाल कपड़ा बांध दें और अक्षत चढ़ाएं.

कलश का पूजन कुमकुम, हल्दी चावल और पुष्प चढ़ाकर करें.

कलश के बाद गणेशजी की पूजा की जाती हैं. गणेशजी की पूजा पूरे विधि-विधान से की जानी चाहिए. उसकी पूरी और सबसे सरल विधि प्रभु शरणम् ऐप्पस में दी गई है. लिंक इस लाइन के नीचे है. यहां से डाउनलोड कर लें.

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उसके बाद शिवजी की पूजा करें.

शिवजी की पूजा के बाद माता गौरी की पूजा की जाती है. उन्हें सम्पूर्ण शृंगार अर्पित किया जाता है. यह पूजा संपन्न करने के बाद तीज व्रत की कथा सुनी जाती है.

यह पूजा आमतौर पर महिलाएं समूह में करती हैं. फिर गणेशजी, शिवजी और पार्वतीजी की सामूहिक आरती की जाती है. माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता है, उस सिंदूर से सुहागन स्त्रियां सुबह अपनी मांग भरें.

शिव-पार्वती की प्रतिमाएं पवित्र जल में विसर्जित कर दें.

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हरतालिका तीज व्रत कथाः

तीज व्रत के माहात्म्य की कथा शिवजी ने पार्वतीजी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण करवाने के उद्देश्य से सुनाई थी. वह कथा इस प्रकार से है-

शिवजी बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था. इस अवधि में तुमने अन्न का त्यागकर केवल वायु का ही सेवन किया. फिर तुमने सूखे पत्ते चबाकर तप किया. माघ की ठंढ़ में तुम जल में खड़े होकर तप किया करती थीं. वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि जलाकर तप किया और शरीर को तपाया.

श्रावण की मूसलाधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न जल ग्रहण किए तप करती रहीं. तुम्हारी इस कष्टदायक तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता पर्वतराज हिमवान बहुत दुःखी और नाराज़ होते थे. तब एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराज़गी देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे.

तुम्हारे पिता ने नारदजी से आने का कारण पूछा तो नारद बोले– हे गिरिराज! मैं भगवान् विष्णु के भेजने पर यहां आया हूँ. आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना चाहते हैं. इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं.

नारदजी की बात सुनकर पर्वतराज प्रसन्न होकर बोले- यदि स्वयं विष्णुजी मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो यह हर्ष की बात है. वह तो साक्षात ब्रह्म हैं. हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पुरुष की जीवनसंगिनी बने.

तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी बैकुंठ लोक चले गए औरर विष्णुजी को विवाह तय होने का समाचार सुनाया परंतु जब सखियों से तुम्हें इस बारे में पता चला तो तुम्हारे दुःख का ठिकाना ना रहा. तुम्हें दुःखी देखकर, तुम्हारी एक सहेली ने दुःख का कारण पूछा.

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तुमने बताया -मैंने सच्चे मन से शिवजी का वरण किया है किन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है. मैं विचित्र धर्मसंकट में हूँ. अब प्राण त्याग देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.

तुम्हारी सखी बहुत समझदार थी. उसने कहा- प्राण छोड़ने का क्या लाभ? संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिए. नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण करे, जीवनपर्यन्त उसी से निर्वाह करे. सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो भगवान् भी असहाय हैं. मैं तुम्हें घनघोर वन में ले चलती हूँ जो साधना स्थल भी है. वहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी नहीं पाएंगे. मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे.

तुमने ऐसा ही किया. तुम्हारे पिता तुम्हें न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए. वह सोचने लगे कि मैंने तो विष्णुजी से अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया है. यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गये और कन्या घर पर न मिली तो बहुत अपमान होगा.

ऐसा विचारकर पर्वतराज ने चारों ओर तुम्हारी खोज शुरू करवा दी. इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगीं. तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया.

रात भर मेरी स्तुति में गीत गाकर जागरण किया. तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुँचा और तुमसे वर मांगने को कहा.

अपनी तपस्या को सफल देखकर तुमने कहा- मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूँ. यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिये. ‘तब ‘तथास्तु’ कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया.

प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित करके अपनी सखी सहित व्रत का वरण किया. उसी समय गिरिराज अपने बंधु-बांधवों के साथ तुम्हें खोजते हुए वहाँ पहुंच गए. तुम्हारी दशा देखकर दुःखी हुए और इसका कारण पूछा.

तुमने कहा-पिताजी, मैंने अपना जीवन कठोर तप में बिताया है. इस तप का उद्देश्य शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करना था. आज मैं सफल रही. आप मेरा विवाह विष्णुजी से करने का निश्चय कर चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की तलाश में एकांत में चली गयी. शिवजी ने मुझसे विवाह का वचन दिया है. अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घऱ चलूंगी कि आप मेरा विवाह महादेवजी के साथ ही करेंगे. पर्वतराज मान गए और तुम्हें घर वापस ले गये. कुछ समय बाद उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ हमारा विवाह किया.

भगवान् शिव ने आगे कहा- तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह संभव हो सका. इस व्रत का महत्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मनवांछित फल देता हूं. अखंड सौभाग्य तथा पुत्र-पौत्र आदि से भरपूरे परिवार के साथ दीर्घायु होती है.

भगवान् शिव ने पार्वतीजी से कहा कि इस व्रत को जो भी स्त्री पूर्ण श्रद्धा से करेगी उसे तुम्हारी तरह अचल सुहाग प्राप्त होगा. देश के बड़े भाग में भाद्रपद की तृतीया को भी यह व्रत मनाया जाता है और यही कथा सुनी जाती है. उसे हरितालिका कहा जाता है.

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