राजा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि होता है. प्रजा का पालन ही उसका एकमात्र कार्य है. राजा को यदि भ्रम हो जाए तो उसकी प्रजा कभी सुखी नहीं होती. आज की राजनीति से यह बात लुप्त हो गई है. देश-प्रदेश के राजा भ्रम से ग्रसित ईश्वर का प्रतिनिधि के स्थान पर स्वयं को ईश्वर मानने लगे हैं. राजा जनक की कथा आज के लोकतंत्र के लिए बहुत सटीक टिप्पणी है.

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मिथिला के राजा जनक ने एकबार विचित्र स्वप्न देखा. राजा जनक को सपना आया कि उनके राज्य में विद्रोह हो गया है. प्रजा ने राजा से गद्दी छीन ली है और उन्हें नगर से खदेड़ दिया है. भूख-प्यास से बेहाल जनक मारे-मारे फिर रहे हैं. तभी राजा ने देखा कि एक सेठ के भवन के बाहर खिचड़ी का प्रसाद बांट जा रहा है. भूख से तड़पते जनक भी वहां गए.
थोड़ी खिचड़ी मांग लाए. वह खिचड़ी खाने बैठे ही थे कि दो सांड लड़ते हुई वहां आ चले आए. लोगों में अफरा तफरी मच गई. किसी का हाथ लगा और राजा के हाथ से खिचड़ी का बर्तन गिर गया. सारी खिचड़ी मिटटी में मिल गयी.
जनक निराश हो गए और दुःख से रोने-बिलखने लगे. रोने से उनकी आंख खुल गई. राजा का भयंकर स्वप्न टूट चुका था. सेवक अपने राजा को जगाने के लिए मंगलगान कर रहे थे.
जनक आश्चर्य में पड़ गए. आखिर सत्य क्या है, सपने में खिचड़ी के लिए तरसता जनक या मिथिलानरेश की प्रशंसा के लिए गाया जाने वाला जयगीत? खिचड़ी जैसे आहार के लिए मिथिला के राजा के तरसने में क्या संकेत है?
जनक ने ज्योतिषियों और पंडितों से अपने सपने का मर्म पूछा. कोई राजा को संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया. जनक दरबार में परमज्ञानी अष्टावक्र पधारे. राजा ने अष्टावक्र को भी अपनी उलझन बताई और इसका विश्लेषण करने को कहा.
अष्टावक्र ने उत्तर दिया- महाराज, न तो वह सच था और न ही यह सच है. सपना एक भ्रमजाल है और संसार एक मायाजाल. न तो स्वप्न शाश्वत था और न ही यह संसार और इसके भोग व वैभव शाश्वत हैं.
आप दो मिथ्याओं का शाश्वत उत्तर खोज रहे हैं. यही तृष्णा है क्योंकि जो झूठा है उसका उत्तर सच कैसे हो सकता है. महाराज! आप प्राणियों के शासक नहीं उनने पालक हैं.आज ईश्वर ने यह कार्य आपको सौंपा है, कल किसी और को सौंप देंगे. यदि कुछ शाश्वत है तो वह है आपका कर्म.
अष्टाव्रक ने कहा- महाराज राजा के यदि लक्षण है. यदि राजा ईश्वर के प्रतिनिधि के स्थान पर स्वयं को ईश्वर समझने लगे तो उस राज्य का नाश तय है. उस पर मलेच्छों का आक्रमण होता है. राजा की प्रवृति वणिक-व्यापारी की हो जाती है. वह प्रजा पर तरह-तरह के कर लगाने को इच्छुक रहता है. उसका एकमात्र उद्देश्य राजकोष भरना होता है. राजा यह समझने लगता है कि राजकोष को भरा रखकर ही वह प्रजा का शासन कर पाएगा. यह उस राज्य के पतन की ओर जाने के संकेत होते हैं.
जनक ने पूछा- एक राजा को जिस दायित्व के साथ भेजा गया है वह उसका निर्वहन कर रहा है या नहीं इसका संकेत कैसे समझें?
अष्टाव्रक बोले- राजा के रूप में आपके कर्म उत्तम हैं या नहीं इसका निर्धारण जनसंवेदना से करें. यदि आपके राज्य में कोई भूखा सोए, कोई स्वयं को सुरक्षित न पाए, किसी को प्रतिदिन अपनी आजीविका पर संकट दिखे तो आप समझ जाइएगा कि आपके संचित पुण्य क्षय हो रहे हैं. आपके पतन की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है.
यदि आपने जनकल्याण के भाव से कार्य किया, प्रजा पर दशांश यानी दस प्रतिशत से अधिक कर का आरोपण नहीं किया तो आपके संचित पुण्य इतने तो रहेंगे कि यदि किसी अन्य जन्म में आप राजा नहीं भी हुए तो भी आपको प्रजापालकर राजा मिलेगा. इसके प्रभाव से आपके हाथ की खिचड़ी नहीं गिरेगी, अर्थात आप भूखे नहीं रहेंगे. आप जनोन्मुख हो जाइए, विधाता ने आपको बहुत बड़े कार्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए चुना है.
जनक अष्टाव्रक के संकेत को समझ गए. उनका खूब सत्कार कर विदा किया और स्वयं कृषि कार्य करने लगे. हल चलाते हुए ही जनक को खेतों में सीता मिली थीं.
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