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शिवपुराणः दधीचि का श्रीहरि को शाप, शिवगण करेंगे परास्त

शिवपुराणः दधीचि का श्रीहरि को शाप, शिवगण करेंगे परास्त

Shiva

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जल्दी ही आपको हर पोस्ट की सूचना whatsapp से मिलने लगेगी। हमारा फेसबुक पेज लाइक कर लें इससे भी आपको पोस्ट की सूचना मिलती रहेगी. इसका लिंक इसी लाइन के नीचे में है.प्रजापति दक्ष के यज्ञ में श्रीविष्णु शिवगणों से क्यों भिड़े? युद्ध किया भी तो आखिर शिवगणों से वह पराजित भी कैसे हो गए? ऐसे प्रश्न अक्सर शिवभक्तों और हरिभक्तों के मन में आते हैं.मुझसे कई बार लोगों ने यह प्रश्न किया है.

इसका उत्तर शिव पुराण में मिलता है. आज वह प्रसंग सुनाता हूं. वैसे महादेव शिव शंभू एप्प में शिवपुराण की सरल व्याख्या कथा की शृंखला इसी सप्ताह से आरंभ हो रही है. यदि शिव पुराण पढ़ना है तो MAHADEV SHIV SHAMBHU एप्प प्ले स्टोर से डाउनलोड कर लें. चलिए कथा की ओर बढ़ते हैं.

नारदजी ने अपने पिता ब्रह्माजी से पूछा- हे परमपिता! दक्ष के यज्ञ में शिवजी का अपमान हुआ था इसलिए माता सती ने स्वंयं को योगाग्नि में भस्म किया. उसके बाद भृगु ने यज्ञरक्षक उत्पन्न कर शिवगणों पर प्रहार भी किया.

श्रीहरि स्वयं वहां उपस्थित थे. श्रीहरि से बड़ा शिवभक्त तो संसार में कोई नहीं फिर उन्होंने महादेव का अपमान होते देख कैसे लिया? फिर शिवजी के भेजे गणों से श्रीहरि ने युद्ध ही क्यों किया और क्यों पराजित भी हुए?

यह प्रश्न मुझे बार-बार व्यग्र कर रहा है. इसका उत्तर देकर तत्काल मेरी इस जिज्ञासा को शांत करने की कृपा करें.

नारद के इस प्रश्न पर ब्रह्माजी बोले- हे नारद, शिवगण वीरभद्र के हाथों श्रीविष्णुजी का पराभव हुआ उसके पीछे पूर्वकाल में उन्हें महर्षि दधीचि द्वारा मिला एक शाप था. श्रीहरि ने एक बार राजा क्षुव की सहायता की थी इसलिए दधीचि ने उन्हें ऐसा शाप दिया था.

नारदजी के अनुरोध पर ब्रह्माजी ने कथा सुनानी शुरू की. महातेजस्वी राजा क्षुव और महर्षि दधीचि में गहरी मित्रता थी. दधीचि ब्राह्मण वर्ण को श्रेष्ठ मानते थे तो क्षुव क्षत्रिय होने के कारण क्षत्रियों को श्रेष्ठ ठहराते थे.

एक दिन क्षुव ने दधीचि से कहा- राजा चारों वर्णों के भरण-पोषण की व्यवस्था करता है. उसके प्राण और सम्मान की रक्षा करता है. वह पृथ्वी पर परमात्मा का प्रतिनिधि है. इसलिए श्रेष्ठ है. सो आप मेरे लिए पूज्य नहीं वरन मैं आपके लिए पूज्य हूं.

क्षुव ने वेद विरूद्ध बात कह दी तो दधीचि ने भी क्रोध में भरकर शास्त्रविरूद्ध आचरण प्रदर्शित करते हुए राजा क्षुव के मस्तक पर एक जोरदार मुक्का मार दिया. इससे तिलमिलाए राजा क्षुव ने तत्काल दधीचि के दो टुकड़े कर दिए.प्राण निकलने से पूर्व दधीचि ने शुक्राचार्य को सहायता के लिए पुकार लिया. शुक्राचार्य आए और दधीचि का शरीर पुनः जोडकर जीवन बचा दिया. इस उपकार के बदले दधीचि ने शुक्राचार्य की विभिन्न प्रकार से स्तुति की तो वह प्रसन्न हो गए.

शुक्राचार्य ने दधीचि को मृतसंजीवनी (महामृत्युंजय) मंत्र का उपदेश देते हुए कहा- यह मंत्र अमरत्व प्रदान करने का साधन है. शिवजी का ध्यान करते हुए इस मंत्र की साधना करने से मृत्यु के भय से मुक्ति और सभी अभीष्ट की प्राप्ति होती है.

शुक्राचार्य के जाने के बाद दधीचि नैमिषारण्य चले गए और इस मंत्र की अखंड साधना करने लगे. उनके तप से शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा. दधीचि ने एक साथ तीन वरदान मांग लिए.

मेरी अस्थियां वज्र की हो जाएं जिसे कोई काट न सके, मैं किसी के हाथों न मारा जाऊं और सर्वत्र आत्मनिर्भर रहूं यानी किसी कार्य के लिए मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता न पड़े. शिवजी ने वरदान दे दिया.

दधीचि क्षुव के पास पहुंचे और उसके मस्तक पर प्रहार किया. क्षुव ने क्रोधित होकर दधीचि पर वज्र चलाया लेकिन शिवजी के आशीर्वाद के कारण व्रज निष्प्रभावी रहा. क्षुव ने लज्जा से पराजय स्वीकार की और वन में विष्णुजी के लिए तप करने लगे.क्षुव की तपस्या फलित हुई. श्रीविष्णु ने दर्शन दिए. क्षुव ने कहा- शिवजी की कृपा से दधीचि ने शक्तियां प्राप्त की हैं और उनका अपमान कर रहे हैं. वज्र भी निष्फल है. प्रभु मैं आपका शरणागत हूं. मेरे सम्मान की रक्षा में सहायता करें.

क्षुव की बात सुनकर श्रीहरि बोले- तुमने भी अच्छा आचरण नहीं किया. दधीचि शिवभक्त हैं. उनके साथ प्रतिशोध की बात न रखो. मैं स्वयं उन्हें तुम्हारे प्रति उदार बनाने और प्रसन्न करने का प्रयास करूंगा. तुम उचित समय की प्रतीक्षा करो.

अपना वचन पूरा करने के लिए श्रीहरि ने एक ब्राह्मण का वेश धरा और दधीचि के पास पहुंचकर एक वरदान देने का अनुरोध करने लगे. दधीचि बोले- शिवजी की कृपा से मुझे प्रत्यक्ष और परोक्ष का बोध हो जाता है. आप वास्तविक रूप में आ जाएं.

मैं आपके आने का प्रयोजन भली-भांति जानता हूं. शिवजी की कृपा से मैं संसार में अवध्य हूं. किसी भी छल-कपट का प्रयोग करके मेरा कोई अहित नहीं किया जा सकता.

विष्णुजी बोले- शिवजी की महिमा से कौन परिचित नहीं. मैं स्वयं शिवभक्त हूं किंतु शरणागत की रक्षा मेरा धर्म है. आप एक बार क्षुव को श्रेष्ठ कह दें. इससे आप छोटे नहीं होंगे लेकिन क्षुव के थोथे स्वाभिमान की रक्षा हो जाएगी. ऋषि को उदार होना चाहिए.

विष्णुजी आगे बोले- क्षुव का आग्रह निराधार है, किंतु उस समय उसकी जैसी मनःस्थिति है उसे देखकर आपसे कहा है. अपमान बोध से ग्रस्त राजा प्रजा के लिए कल्याणकारी नहीं हो पाता. मैं बाद में उसे बता दूंगा कि आपने क्षुव को श्रेष्ठ मेरे कहने पर माना था.श्रीहरि दधीचि को समझाने का प्रयत्न कर रहे थे पर दधीचि तो शिवकृपा प्राप्तकर अभिमान में थे. वह कुछ सुनने को तैयार न थे और बोले- मेरे शरीर में आप समस्त ब्रह्मांड देख सकते हैं. आप मुझे मायाजाल में फंसाने का व्यर्थ प्रयास कर रहे हैं.

विष्णुजी को क्रोध आ गया. उन्होंने अनगिनत गणों की रचना की. गण दधीचि पर टूट पड़े लेकिन शिवजी के वरदान से उनकी रक्षा होती रही. गणों को भस्म कर दिया. अब श्रीहरि ने विष्णुमूर्ति प्रकट की और दधीचि को सबक देने का निर्णय किया.

दधीचि ने फिर से श्रीहरि को ललकारा और बोले- मुझ पर आपकी किसी माया का प्रभाव नहीं होगा. मैं शिवजी की शरण में हूं. आपके सभी प्रयास सब व्यर्थ जाएंगे. आप यहां से चले जाएं.

हे नारद! क्रुध श्रीहरि दधीचि का अनिष्ट करने जा ही रहे थे कि मैं क्षुव के साथ वहां प्रकट हुआ. मैंने श्रीहरि के मन में प्रेरणा दी और उन्हें शांत कराया. श्रीहरि ने दधीचि से खेद प्रकट किया.

क्षुव ने जब श्रीहरि को दधीचि के सामने विनम्र देखा तो उसका भ्रम मिट गया. उसने दधीचि से क्षमा मांगी और उन्हें श्रेष्ठ मानकर दंडवत किया. दधीचि ने क्षुव को क्षमा कर दिया लेकिन श्रीहरि और उनके सहायक देवों को क्षमा न किया.

दधीचि ने शाप दिया- श्रीविष्णु के सहायक बनकर मेरा अनिष्ट करने आए देवगणों और इसके साक्षी बने मुनिश्वरों, शिवजी के क्रोध की अग्नि में एक दिन तुम सब विष्णु के साथ-साथ शिवगणों से पराजित और अपमानित होगे.

हे पुत्र नारद! उस शिवभक्त का शाप खाली न जाए इसके लिए ही विष्णुजी उस यज्ञ में पहुंचे और शिवगण वीरभद्र को स्वयं अपने पराजय की विधि बताई.

(शिव पुराण रूद्र संहिता, सती खंड-2)

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