श्रीरामचरितमानस- बालकांडः रामकथा की महिमा न्यारी, मंगल भवन अमंगल हारी
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तुलसीदासजी ने अवधी भाषा में श्रीरामचरितमानस की रचना आरंभ की तो उन्हें ज्ञात था कि विधर्मियों द्वारा भाषाशैली को लेकर आक्षेप किया जाएगा, हीन बताया जाएगा. इसलिए उन्होंने अनुरोध किया कि जिसमें श्रीराम नाम आए वह कविता के गुणों से हीन होने पर भी परम कल्याणकारी होता है.
दोहा :
भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक॥9॥
भावार्थ:- तुलसीदास जी कहते हैं- मेरी रचना सब गुणों से रहित है. इसमें जगत प्रसिद्धि के अतिरिक्त कोई गुण नहीं है. उसे विचारकर अच्छी बुद्धिवाले और निर्मल ज्ञान से युक्त लोग इसे सुनेंगे.
चौपाई :
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा॥
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥1॥
भावार्थ:- इसमें श्री रघुनाथजी का उदार नाम है जो अत्यन्त पवित्र है. यह नाम सभी वेद-पुराणों का सार है, कल्याण का भवन या आसरा है और अमंगलों को हरने वाला है जिसे पार्वतीजी सहित भगवान शिवजी सदा जपा करते हैं.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोउ॥
बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना बर नारी॥2॥
भावार्थ:- अच्छे कवियों के द्वारा रची हुई सुंदर रचनाएं भी राम नाम के बिना वैसे ही शोभाहीन है जैसे चन्द्रमा के समान मुख वाली सुंदर स्त्री सब प्रकार से सुसज्जित होने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं देती.
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी॥
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही॥3॥
भावार्थ:- इसके विपरीत, कविता की कला से हीन पुरुष जिसकी कविता रचना के सभी गुणों से रहित हो फिर यदि उसमें श्रीराम के नाम एवं यश का गान है तो बुद्धिमान लोग उसे आदरपूर्वक सुनते हैं क्योंकि संतजन तो भौंरे जैसे होते हैं जो सिर्फ गुण ही ग्रहण करते हैं.
जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥
सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा॥4॥हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.भावार्थ:- यद्यपि मेरी इस रचना में कविता का एक भी रस नहीं है, तथापि इसमें श्री रामजी का प्रताप प्रकट है. मेरे मन में यही एक भरोसा है. भले संग से भला, किसने बड़प्पन नहीं पाया?
धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई॥
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी॥5॥
भावार्थ:- धुआँ भी अगर के संग से सुगंधित होकर अपने स्वाभाविक कड़ुवेपन को छोड़ देता है और सुगंधित हो जाता है. मेरी कविता अवश्य रसयुक्त नहीं है, परन्तु इसमें जगत का कल्याण करने वाली रामकथा रूपी उत्तम वस्तु का वर्णन किया गया है. इसलिए यह भी अच्छी समझी जाएगी.
छंद :
मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥
भावार्थ:- तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी की कथा कल्याण करने वाली और कलियुग के पापों को हरने वाली है. मेरी इस भद्दी कविता रूपी नदी की चाल पवित्र जल वाली नदी (गंगाजी) की चाल की भाँति टेढ़ी है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.प्रभु श्रीरघुनाथजी के सुंदर यश के संग से यह कविता सुंदर तथा सज्जनों के मन को भाने वाली हो जाएगी. श्मशान की अपवित्र राख भी श्रीमहादेवजी के अंग के संग से सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करने वाली होती है.
दोहाः
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।
दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग॥10 क॥
भावार्थ:- श्रीरामजी के यश के संग से मेरी कविता सभी को अत्यन्त प्रिय लगेगी. जैसे मलय पर्वत के संग से काष्ठमात्र (चंदन बनकर) वंदनीय हो जाता है, फिर क्या कोई काठ की तुच्छता का विचार करता है?
*स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥10 ख॥
भावार्थ:- श्यामा गो रूप में काली होती है फिर भी उसका दूध उज्ज्वल और बहुत गुणकारी होता है. इसी तरह गँवारू भाषा में होने पर भी श्रीसीतारामजी के यश को बुद्धिमान लोग बड़े चाव से गाते और सुनते हैं.
संकलन व संपादनः प्रभु शरणम्
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