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भजन-पूजन आवश्यक हैं, पर उससे भी ज्यादा आवश्यक है मिटाना अंदर का अज्ञान

भजन-पूजन आवश्यक हैं, पर उससे भी ज्यादा आवश्यक है मिटाना अंदर का अज्ञान

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एक महात्माजी गौतम बुद्ध के पास आए और कहा- हे बुद्ध! आप सुनी सुनाई बातें नहीं कहते. अपने गहन अनुभव के आधार पर विचार देते हैं. आप धर्म और सिद्धान्त के बजाय वह ज्यादा कहते हैं स्वयं देखी-महसूस की है.

आपने कहा था- मुक्ति का मार्ग है अपने विवेक को जगाना और पूर्ण ध्यान में लिप्त हो जाना जिससे मनुष्य स्वयं को और इस संसार को भली भाँति समझ सकता है. परन्तु हे भगवान एक प्रश्न है. ये रीतियां, पूजा-पाठ क्या ये सब व्यर्थ हैं?

गौतम बुद्ध ने एक नदी की ओर इशारा करके महात्माजी से कहा- यदि कोई व्यक्ति इस नदी के दूसरे किनारे पर जाना चाहे तो वह क्या करे?

महात्मा बोले- यदि जल गहरी नहीं है तो वह चलकर जा सकता है और यदि जल गहरा है तो नांव की सहायता से उस पार जा सकता है, या तैरना आता हो तो स्वयं तैरकर जा सकता है.बुद्ध ने पूछा- यदि वह व्यक्ति चलना भी न चाहे, तैरने को भी तैयार हो और न ही नांव में जाने को तैयार हो पर कहे कि मैं प्रार्थना करता हूँ कि इस नदी का दूसरा किनारा स्वयं चल कर मेरे पास आ जाए तो?

महात्मा जी ने कहा- प्रभु ऐसे व्यक्ति को तो मूर्ख नहीं महामूर्ख ही कहा जा सकता है.

बुद्ध बोले- इसी प्रकार व्यक्ति अज्ञान को अपने विवेक से मिटायेगा नहीं तो परम आनन्द और मुक्ति के दूसरे छोर तक कैसे पहुंच पायेगा? चाहे वह कितनी पूजा या अनुष्ठान कर ले पर शास्त्रों की बताई किसी नीति पर न चले तो वह इस किनारे ही रहेगा.

महात्मा जी गदगद होकर बोले- हमें आज तक जीवन के इतने जटिल तथ्य को इतनी सरलता से किसी ने नहीं समझाया. आपने धर्म की उचित व्याख्या करके मन का भ्रम मिटाया.

ईश्वर ने मनुष्य को सबसे ज्यादा विवेकशील प्राणी बनाकर इसलिए भेजा क्योंकि उन्हें आशा थी कि मनुष्य अपने विवेक के प्रयोग से ईश्वर के भावों को अच्छे से समझकर उसपर चले.संसार के प्रत्येक प्राणी को परमात्मा का अंश मानकर उसके साथ उचित व्यवहार करे. अपने ह्दय में प्रेम, करूणा और धर्म को स्थान देकर परम आनन्द को प्राप्त करे जो उसे मुक्ति का मार्ग दिखाए.

विवेक का प्रयोग हम वैसे नहीं कर रहे जो प्रभु की इच्छा है. हमने गलत व्याख्या कर ली कि चाहे तमाम पाप कर लो लेकिन पूजा-पाठ या दान करो तो सब पापों से मुक्ति हो जाएगी. यह कुछ और नहीं बल्कि नदी के छोरों के पास आने की प्रतीक्षा जैसा है.

यह कथा मुरादाबाद यूपी से अजय सैनीजी ने भेजी है. अजयजी कंप्यूटर इंजीनयरिंग के विद्यार्थी हैं. यदि आपके पास भी है कोई प्रेरक या धार्मिक कथा तो हमें भेजें.

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प्रभु शरणम्

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