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शिष्य के इस भोले से प्रश्न को सुनकर गुरु श्रीरामकृष्ण परमहंस मुस्कुरा उठे.
वह हंसकर बोले- “पुत्र इस लोटे की यह चमक एक दिन की एक मेहनत से नहीं आई है. इसमें आई मैल को हटाने के लिए नित्य-प्रति मेहनत करनी ही पड़ती है.
ठीक वैसे ही जैसे जीवन में आई बुराइयों, बुरे संस्कारों को दूर करने के लिए हमें रोजाना ही संकल्प करना पड़ता है. तुमने कहा कि मेरे दर्शन या प्रवचन से बहुत से लोगों का जीवन बदल सकता है परंतु यह तो तभी होगा न जब मैं स्वयं खुद को चमकाकर मांजकर रखूं.
संकल्प के साथ स्वयं को अच्छा चरित्रवान इंसान बनाने के लिए हमें रोजाना के अभ्यास से ही अपने दुर्गुणों का मैल दूर करना पड़ता है. लोटा हो या व्यक्ति का जीवन, उसे बुराइयों के मैल से बचाने के लिए हमें रोजाना ही कड़ा परिश्रम करना पड़ेगा.
एक दिन की चूक भी स्वीकार नहीं की जा सकती क्योंकि उसी एक दिन की चूक जीवनभर के तप को निगल जा सकती है.
चमक लोटे की हो या इंसान की तभी बची रहेगी जब उसे निर्बाध गति से मांजते रहा जाए.
तुम बहुत होनहार व्यक्ति हो. तुम स्वयं को इस लोटे की भांति समझना. मेरी एक बात को गांठ बांधकर रख लो. कभी भी स्वयं को पूर्णतः परिपक्व और हरप्रकार से योग्य मत समझना बल्कि हमेशा यह भाव रखना कि तुममें सुधार की बहुत संभावना और आवश्यकता है.
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