February 18, 2026

श्रीरामचरिचतमानस-बालकांडः जद्यपि बर अनेक जग माहीं, एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं

सांदीपनि ऋषि श्रीकृष्ण बलराम सुदामा आदि शिष्यों को शिक्षा देते हुए

जगन्नाथजी की यात्रा आरंभ हुई है. आज हम जगन्नाथजी की महिमा से जुड़े पोस्ट देने का प्रयास करेंगे. गुप्त नवरात्रि का दूसरा दिवस है. आज माता ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है. अभी रामचरितमानस में नारदजी और हिमवानजी की चर्चा का प्रसंग देखते हैं.

नारदजी पार्वतीजी के पिता महाराज हिमवान और माता मैनाजी को समझा रहे हैं. संसार में वर तो अनेक हैं परंतु पार्वतीजी के लिए शिवजी ही सर्वश्रेष्ठ हैं.

दोहा :
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥69॥

नारदजी समझा रहे हैं- यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञान के अभिमान से इस प्रकार होड़ करते हैं, तो वे पूरे कल्प के लिए नरक में जाते हैं. भला कहीं जीव भी ईश्वर के समान सर्वथा स्वतंत्र हो सकता है?

चौपाई :
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥1॥

मदिरा गंगाजल से बनाई जाती है फिर भी संत लोग उसका सेवन नहीं करते क्यों वह मदिरा है. पर वही गंगाजी में मिल जाने पर जिस तरह पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीव में भी वैसा ही भेद समझना चाहिए.

संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥
दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू॥2॥

शिवजी सहज ही समर्थ हैं क्योंकि वह भगवान हैं. इसलिए इस विवाह में सब प्रकार कल्याण है, परन्तु महादेवजी की आराधना बड़ी कठिन है. फिर भी तप करने से वे बहुत जल्द संतुष्ट हो जाते हैं.

जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥3॥

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नारदजी कहते हैं- यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेवजी होनी को बदल सकते हैं. यद्यपि संसार में वर अनेक हैं पर पार्वती के लिए शिवजी को छोड़कर दूसरा वर नहीं है.

बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥
इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥4॥

शिवजी वर देने वाले, शरणागतों के दुःखों का नाश करने वाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं. शिवजी की आराधना किए बिना करोड़ों योग और जप करने पर भी वांछित फल नहीं मिलता.

दोहा :
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस॥70॥

ऐसा कहकर भगवान का स्मरण करके नारदजी ने पार्वती को आशीर्वाद दिया और कहा कि- हे पर्वतराज! तुम संदेह का त्याग कर दो. जो होने वाला है वह परम कल्याणकारी ही होगा.

चौपाई :
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ॥
पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना॥1॥

यों कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को चले गए. अब आगे जो हुआ उसे सुनो. पति को एकान्त में पाकर मैना ने कहा- हे नाथ! मैंने मुनि के वचनों का अर्थ नहीं समझा.

माता का हृदय का व्याकुल है. वह परम रूपवती और गुणवती कन्या का विवाह कैसे एक अड़भंगी से कैसे कर दें जिसका न तो कोई घर-बार है न सुंदर रूप-स्वरूप. वह शिवजी के प्रभाव को नहीं समझती हैं इसलिए स्त्री सुलभ बात कह रही हैं.

जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा॥
न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी ॥2॥

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जो हमारी कन्या के अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिए. नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे. मैं अयोग्य वर के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती क्योंकि हे स्वामिन्‌! पार्वती मुझको प्राणों के समान प्यारी है.

जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥3॥

यदि पार्वती के योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ यानी मूर्ख होते हैं. हे स्वामी! इस बात को विचारकर ही विवाह कीजिएगा, जिसमें फिर पीछे हृदय में सन्ताप न हो.

अस कहि परी चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा॥
बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं॥4॥

इस प्रकार कहकर मैना पति के चरणों पर मस्तक रखकर गिर पड़ीं. तब हिमवान ने प्रेम से कहा- चाहे चन्द्रमा में अग्नि प्रकट हो जाए पर नारदजी के वचन झूठे नहीं हो सकते.

दोहा :
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान॥71॥

हे प्रिये! सब सोच छोड़कर श्री भगवान का स्मरण करो, जिन्होंने पार्वती को रचा है, वे ही कल्याण करेंगे.

चौपाई :
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावनु देहू॥
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू॥1॥

अब यदि तुम्हें कन्या पर प्रेम है, तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे, जिससे शिवजी मिल जाएं. दूसरे उपाय से यह क्लेश नहीं मिटेगा.

नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका॥2॥

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नारदजी के वचन रहस्य से युक्त और सकारण हैं और शिवजी समस्त सुंदर गुणों के भण्डार हैं. यह विचारकर तुम मिथ्या संदेह को छोड़ दो. शिवजी सभी तरह से निष्कलंक हैं.

संकलनः राजन प्रकाश

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