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भोलेनाथ ने कहा– आपने कोई पाप नहीं किया है. उन दुष्टों ने छल-कपट से घोर अत्याचार किया. इसलिए वे ही पापी, हत्यारे और दुराचारी हैं. उन कृतघ्नों का कभी उद्धार नहीं होगा. उन दुरात्माओं पर जिनकी दृष्टि पड़ जाएगी वे भी पापी बन जाएंगे.
भगवान की बात सुनकर गौतम उन्हें बार-बार स्तुतिकर शांत किया और कहा– भगवान् उन्होंने तो मेरा बड़ा उपकार किया. उनके दुराचार से ही मेरा महान कार्य सिद्ध हुआ है. उनके व्यवहार से ही हमें आपके दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो सके.
गौतम की दयालुता से महादेव अभिभूत हो गए और बोले– विप्रवर! आप सभी ऋषियों में श्रेष्ठ हैं. मैं आप पर अत्यंत प्रसन्न हूँ, इसलिए आप अपने लिए कोई उत्तम वर माँग लें.
गौतम ऋषि ने कहा- प्रभु मुझे स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए. लोक कल्याण के लिए आप मुझे गंगा प्रदान कीजिए. यह कहते हुए गौतम ने भगवान शिव के चरण पकड़ लिए.
तब भगवान महेश्वर ने पृथ्वी और स्वर्ग के सारतत्व रूपी उस जल का आह्वान किया जो ब्रह्माजी ने उन्हें उनके विवाह के अवसर भेंट किया था. वह परम पवित्र जल स्त्री रूप धारण करके वहां पहुंचा. गौतम ने उसकी स्तुति और स्वागत किया.
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” Har Har Mahadev “
आपके शुभ वचनों के लिए हृदय से कोटि-कोटि आभार.
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