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एक मांस का टुकड़ा उठाया मैंने। उस पर मंत्र पढ़ा। भक्क से पूरा अपने मुंह में भर लिया और मंत्र पढ़ते हुए निगल लिया।
इस क्रिया से मेरा दुहित्रात-मंत्र जागृत हो गया। मेरी रीढ़ की हड्डी दहक उठी।
अब मैं, मैं ना रहा।
मैं एक अत्यंत क्रोधित औघड़ में परिवर्तित हो गया। आवाज़ भारी हो गयी। अब कोई विनय-अनुनय नहीं। बस सीधी टक्कर।
सोनिला बाबा का अट्ठहास बंद हो गया। उसे स्थिति की गंभीरता का एहसास हो गया था।
वो हवा में उठ गया, और मैं भी खड़ा हो गया।
उसने मंत्रोच्चार किया। और वहाँ एक नाग-कन्या उत्पन्न हुई। जो पलभर में ही महा-पिशाचिनी के रूप में परिवर्तित हो गयी।  मैंने त्रिशूल को चाटा और सामने से आती हुई नाग-कन्या के उदर में घुसेड़ दिया।
तत्क्षण एक सर्प मूर्छित हो नीचे गिरा।
अब मैंने अट्ठहास लगाया।
तभी उसने फिर से मंत्र पढ़ा और द्रुतिका नामक वृषभ-वाहिनी प्रकट हुई। जो दौड़ी मेरी ओर मेरेटुकड़े करने।  मैंने त्रिशूल को सम्मुख किया और उससे टकरा दिया। ऐसा करते ही वो पलटकर बाबा को पार करते हुए विलोप हो गयी।
यह देखकर बौखला गया बाबा।
मैं गरजा “असहायों पर क्रूरता की है तूने आज तक। सच्चा औघड़ नहीं टकराया तुझे।  तूने इन निरीह नाग-वंशियों को सताया। तुझे दंड मिलेगा” मैंने कहा, कुछ नहीं बोला बाबा। कुछ पल शान्ति के बीते। और फिर अट्ठहास, चहुंदिश भीषण अट्ठहास।

सोनिला का अट्ठहास बड़ा ही कड़क था।  कोई और होता तो उसे सुनकर ही भाग जाता। सोनिला जहांनाग-विद्या में अत्यंत माहिर था वहीँ एक प्रबल तांत्रिक भी था।
“अरे बालक, अब तक मैंने खेल खिलाया तुझे। ” सोनिला गरजा।
अब तक मैंने गुड़ की एक भेली मंत्र पढ़ते हुए, वहीँ गाड़ दी थी। अब मैंने खेल गम्भीरता से खेलना आरम्भ किया, मुझे एक नाग-कन्या क्रिताक्षिका का आशीर्वाद प्राप्त था।  उसने मुझे रक्ताभ्रक भी प्रदान किया था और कभी भी मदद का वचन भी दिया था। मैंने क्रिताक्षिका का आह्वान किया, वो स्थान रौशन हुआ लाल प्रकाश से और वहाँ सजी-धजी क्रिताक्षिका प्रकट हो गयी।

ये देख बाबा जैसे गिरते गिरते बचा। मैंने क्रिताक्षिका को नमन किया और मौन रूप से मैंने अपना उद्देश्य सम्प्रेषित किया।  क्रिताक्षिका मुस्कुराई और मुझे एक माला देते हुए लोप हुई। मैंने वो माला धारण कर ली।
सोनिला बाबा अब गहन मंत्रोच्चार में डूब गया। और इधर मैं भी।
बाबा ने कर्णिका नाम की एक शक्तिशाली गणिका प्रकट की, मेरे पास गणिका की शक्ति काटने के लिए उस समय न तो चिता थी और न ही कोई घाड़(मुर्दा शरीर)।  अत्यंत चतुर बाबा ने युक्ति से काम ले लिया था।

 

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