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फौजी अपनी उपलब्धियों का बखान कर ही रहा था कि अचानक संत ने उसको रोका. फिर रूखे अंदाज में बोल पड़े- देखो, धैर्य से तुम्हारी बातें सुन रहा हूं इसका मतलब यह नहीं कि मैं मूर्ख हूं. तुम कुछ भी कहते जाओगे, मैं मान जाऊंगा. डींगें हांकना बंद करो. मुझे तुम्हारी किसी भी बात पर भरोसा नहीं है.

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अब तो मुझे इस बात पर भी भरोसा नहीं रहा कि तुम फौज में भी हो. कौन मानेगा तुम्हें फौज का अधिकारी! शक्ल सूरत से तुम फौजी अधिकारी नहीं गली के उचक्के लगते हो जो लोगों से लूट-पाट करता है. अपनी शेखी बघारना बंद करो और यहां से जाओ.

इतना सुनते ही वह फौजी तमतमा गया. उसने अपनी पिस्तौल निकालकर संत के सिर पर तान दी.

इस पर संत ने कहा- मैंने कहा था न कि तुम उचक्के हो. अपने साथ नकली बंदूक भी रखते हो ताकि असलियत खुलने लगे तो तुम लोगों को इससे डरा सको. मैं असली और नकली में फर्क समझ लेता हूं. ये नकली बंदूक वापस रखो और यहां से दफा हो जाओ.

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पहले मुझे नकली और उचक्का कहा, अब मेरी पिस्तौल को भी नकली कह रहा है. इस मूर्ख को तो सबक सिखाना ही होगा. फौजी के क्रोध की कोई सीमा ही न रही.

उसने महात्माजी को गोली मारने का निश्चय कर लिया. गोली मारने के लिए पिस्तौल का बोल्ट खींचा.

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