शुक्ररूप में शिवजी के शरीर से निकले शुक्र, पार्वतीजी ने मान लिया पुत्र. क्यों शुक्र रूप में निकलना पड़ा दैत्यगुरू को? अंधकासुर कथा भाग-3

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पिछले दो भाग में आपने पढ़ा कि कैसे देवी पार्वती द्वारा महादेव के त्रिनेत्र मूंद देने से समस्त संसार अंधकारमय हुआ और उनके पसीने से अंधक का जन्म हुआ. अंधक को महादेव ने असुरराज हिरण्याक्ष को दिया.
अंधक ने ब्रह्मा को तप से प्रसन्न कर वरदान ले लिया कि उसकी मृत्यु का कारण माता पर आसक्ति बने. अंधक पार्वतीजी पर मुग्ध हो गया. उसने पार्वतीजी को पाने के लिए शिव से युद्ध शुरू किया.
परंतु शिवजी उसे अपना पुत्र समझकर माफ करते गए. असुरों के गुरू शुक्राचार्य को प्राप्त मृत संजीवनी के दम पर वह फिर से शिव से युद्ध ठान रहा था. शुक्राचार्य शिवजी से मिली विद्या का प्रयोग शिवजी के विरूद्ध कर रहे थे.
इसलिए शिव ने उन्हें लील लिया और अंततः महादेव के लिंग के रास्ते शुक्र रूप में बाहर आए. इसीलिए उन्हें शुक्र नाम मिला और शुक्राचार्य हुए. यहां तक की कथा आपने पहले पढी. अंधकासुर की कथा आगे बढ़ाने से पहले शुक्राचार्य की यह कथा भी पढते चलें.
महर्षि अंगिरा और भृगु मुनि में मित्रता थी. अंगिरा और भृगु के समान आयु के दो पुत्र थे. अंगिरा के पुत्र थे जीव जबकि भृगु के पुत्र का नाम था कवि. दोनों बालक अंगिरा के आश्रम में रखकर उनसे शिक्षा ग्रहण करने लगे.
दोनों बालक तेजस्वी और बुद्धिमान थे किन्तु पुत्र मोह के कारण अंगिरा दोनों में भेदभाव करने लगे. उन्होंने अपने पुत्र जीव की शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया जबकि कवी की शिक्षा को लेकर वह नीरस रहने लगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
कवी इससे दुखी थे और अंगिरा को उन्होंने अपनी पीड़ा बताई. कवी ने अंगिरा से कहा- गुरुवर यदि गुरू शिष्यों में भेदभाव करने लगे तो यह कदापि धर्मानुकूल नहीं होता. शिष्य पुत्र समान होता है. इसलिए आपका भेद मुझे दुखी करता है.
अंगिरा ने कवी की बात अनसुनी कर दी और पहले के भांति दोनों को पृथक-पृथक पढ़ाते रहे. अंततः कवी आश्रम छोड़कर अपने घर लौट चला. कवी, गौतम मुनि के आश्रम पहुंचा और उनसे अंगिरा से श्रेष्ठ गुरू के बारे में पूछा जिससे वह शिक्षा ले सकें.
गौतम ने कहा- संसार में केवल भगवान शिव ही एकमात्र योग्य गुरु हैं. वह ही सृष्टि के गूढ़ से गूढ़ रहस्यों को जानते है. उनके लिए कोई भी विद्या अछूती या अदृश्य नहीं है.
कवी ने गौतम मुनि से पूछा कि भगवान शिव के दर्शन कैसे होंगे. गौतम मुनि ने उन्हें शिवमंत्र देकर आराधना की विधि बताई और शिव को प्रसन्न करने का परामर्श दिया.
कवी ने महादेव गौतम की बताई विधि से शिवजी को प्रसन्न करने के लिए घोर तप शुरू किया. एक बालक के तप से प्रसन्न होकर प्रभु ने दर्शन दिए और पूछा कि इस आयु में इतना कठिन तप क्यों कर रहे हो.
कवी ने कहा- प्रभु आपसे क्या छुपा. तप का उद्देश्य भली-भांति जानते हैं. मेरे गुरू बनकर मुझे दीक्षित करें. शिवजी ने सभी लौकिक और अलौकिक शास्त्रों का ज्ञान दिया. साथ ही मृत प्राणियों को जीवित कर देने वली मृत संजीविनी विद्या भी सिखाई जिसे देवता भी नहीं जानते थे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
परम ज्ञानी बनकर कवि देवताओं के पास गए. लेकिन उनके साथ फिर भेदभाव हुआ. देवताओं ने कवी को गुरू बनाने के स्थान पर अंगिरा पुत्र जो अब बृहस्पति नाम से प्रसिद्ध हुए, उन्हें गुरू बना लिया.
बचपन में अंगिरा के कारण कवी दुखी था, बड़े होने पर उनके पुत्र के कारण. इससे कुपित कवि असुरों के गुरू बन गए. वह महादेव द्वारा दिए मृत संजीवनी विद्या के बल पर असुरों को जीवित कर देते थे. इसलिए असुरों में उनका बड़ा सम्मान था.
अंधकासुर के साथ जब महादेव का संग्राम शुरू हुआ. महादेव ने दैत्य सेना का विनाश कर दिया. निराश अंधक ने दैत्यगुरू से सेना को फिर से जीवित करने की विनती की. शुक्राचार्य शिवजी द्वारा मिली मृत संजीवनी विद्या से दैत्यों को जीवित करने लगे.
दैत्यगुरू ने असुरों को जीवित करना शुरू किया तो अंधकासुर महादेव पर आक्रमण करके देवी पार्वती को प्राप्त करने की मंशा फिर से बनाने लगा. अंधकासुर को समझाने प्रहलाद आए.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
उन्होंने अंधक को समझाया कि यदि उसने देवी पार्वती को प्राप्त करने की इच्छा नहीं छोड़ी तो असुर जाति का विनाश हो जाएगा. प्रह्लाद ने उसे समझाने के लिए कई कथाएं सुनाईं.
इधर शुक्राचार्य उन असुरों की जीवित कर रहे थे जिनका महादेव ने वध किया था. यह बात शिवगणों ने जाकर महादेव को बता दी. महादेव अत्यंत क्रोधित हुए. शुक्राचार्य को सबक सिखाने के लिए महादेव ने उन्हें लील लिया.
शुक्राचार्य महादेव के उदर में 100 साल तक रहे और समस्त संसार को देखा. वह महादेव के कान के रास्ते निकल आए. फिर से उन्होंने अपना वही कार्य शुरू कर दिया. जिसे मृत संजीवनी विद्या आती हो उसका वध तो हो नहीं सकता.
महादेव ने फिर से उन्हें लील लिया. इस बार वह नाक के रास्ते बाहर निकल आए. शिव ने फिर से उन्हें लील लिया और इस बार उन्होंने लिंग को छोड़कर शरीर के सभी अंगों को बंद कर दिया.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[sc:mbo]
शुक्राचार्य महादेव के लिंग के रास्ते शुक्ररूप में बाहर आए. इसलिए उन्हें शुक्राचार्य कहते हैं. इस बार शिव ने उन्हें भस्म करने के उद्देश्य से पकड़ने को हाथ बढाया तो वह माता पार्वती की शरण में चले गए.
माता ने सदाशिव से कहा- यह शुक्र रूप में बाहर आया है इसलिए आपके पुत्र सदृश है. मैं इससे पुत्रवत स्नेह देती हूं. महादेव ने दैत्यगुरू को माफ कर दिया, शुक्राचार्य ने भी अपने कार्यों के लिए क्षमा मांगी.
एक तरफ तो अंधक को प्रह्लाद तरह-तरह से शिव से शरण में जाने को समझा रहे थे. उधर उसे पता चला कि महादेव ने शुक्राचार्य को भी लील लिया है. इससे वह और बौखला गया और शक्तियां जमा करने लगा.
प्रह्लाद अंधक से पूर्व असुरों के राजा थे. उन्हें अपने कुल का विनाश नजर आ रहा था इसलिए उन्होंने अंधक को कई उत्तम कथाएं सुनाई थीं. कथा का अगला भाग कुछ देर में अगले पोस्ट में पढ़िए.
संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली