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कोई दुःख के सागर में गोते खाता आंसू टपकाता, रोता हैं. कोई प्रसन्न मन नाचता हैं. कोई धन के लिए अनेक उपाय करता हैं, तो कोई षड्यंत्र रचता रहता है. इस माया के प्रभाव से संसार के सभी जीव, पुत्र, स्त्री, धन आदि में आसक्त हो रोते-गाते रहते हैं |
इतना उपदेश देकर ब्राह्मण ने रानी का हाथ पकड़ लिया. वह ब्राह्मण स्वयं भगवान विष्णु थे. उन्होंने कहा- नारदजी! यह माया विष्णु ने स्वयं निर्मित की है. तुमने विष्णु की माया देख ली.

अब उठो ! स्नानकर अपने मृत पुत्र-पौत्रों को अर्घ्य देकर अपना कर्तव्य पूरा करो. इतना कहकर भगवान ने नारदजी को उसी सरोवर में स्नान कराया जिसमें नहा कर वे सुंदरी बने थे.

स्नान करते ही नारद मुनि अपने वास्तविक रूप में आ गए. राजा ने देखा कि यह तो यह मेरी रानी नहीं, जनेऊ पहने, जटाधारी, दण्ड-कमण्डल और वीणा लिए, मुनि महाराज हैं तो वह हतप्रभ रह गया.

अगले ही क्षण भगवान नारद का हाथ पकड़कर श्वेतद्वीप आ गए और नारद से पूछा- नारदजी! आपने मेरी माया देख ली. माया कष्टकारी और बांधने वाली है. इसलिए में साधुजनों को इससे मुक्त रखता हूं.

नारदजी ने भी संकोच में भरकर उन्हें प्रणाम किया. कोई उत्तर देते इससे पूर्व भगवान् अंतर्धान हो गए.
(भविष्य पुराण से)

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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