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अगले दिन राजा के सैनिकों ने खोजते खोजते वस्त्रों पर लगे महावर के चिन्हों के द्वारा पुत्रक को पहचान कर पकड़ लिया और राजा के सामने ला खड़ा किया.

पुत्रक समझ गया मामला बिगड़ चुका है इसलिए वह आनन फानन में खडाऊं पहन आकाश में उड़ गया. सीधा रनिवास पहुंचा और पाटली से बोला- तुम्हारे पिता को हमारा रहस्य पता चल गया है, आओ हम आकाश में उड़ चलें.

पाटली तुरंत तैयार हो गयी और पुत्रक उसे गोद में उठाये हुए उड़ता-उड़ता गंगा के किनारे पहुंचा. पुत्रक अपनी प्रिया पाटली को अपने दिव्य पात्र से मनचाहा भोजन कराता. यहां दोनों सुख से गंगा तट पर रहने लगे.

कुछ दिनों बाद पाटली ने गंगा के तट पर ही स्थायी निवास करने की इच्छा प्रकट की, पुत्रक ने मय राक्षस की लाठी से वहां एक नगर लिख दिया. तत्काल पाटलिपुत्र नगर बस गया.

(कुछ ही देर में पढ़ें शिवजी द्वारा सुनाई गई कथा.)

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