मेरी अंतरात्मा मुझे धिक्कार रही थी मेरा गम दूर करने वाला कोई न था। मानव समाज को मैं सबसे बड़े बैरी के रूप में देखने लगा। जो सिर्फ अपना बुद्धि और बल दिखाने के लिए निर्दोषों का कत्ल करने से भी नहीं चूकता। अब मेरे अन्दर बदले की भावना ने जन्म ले लिया। और ठान लिया कि इस खेत मालिक से अपने भाई की मौत का बदला ले के रहूँगा।

तब से मैंने कई बार उससे बदला लेने की कोशिश की लेकिन हर बार असफलता ही हाथ लगी।

लेकिन कुछ समय बाद वह एक हादसे में मारा गया। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा।  लेकिन अब मैं बिल्कुल असहाय, दुखी हो चुका था बावरा पागल सा इधर उधर घूमता जिंदगी का कोई ध्येय न रहा था।

मैंने गंगा स्नान कर ही लिया था और अपने भाई को उसके नाम से गंगा स्नान करवा दिया था। तो बस कभी इधर ,कभी उधर उपरवाले से हर समय दुआ करता था, कि मुझे भी योनि से मुक्त कर दें।

लेकिन उसके कान पे तो जूं तक नहीं रेंग रही थी।  लगता था, उसने मेरे लिए सुनने के सभी दरवाजे बंद कर दिए गए हो।

मैं सोच रहा था कहीं बाहर चला जाऊं। वहीँ अपना जीवन यापन करूँ और शायद गम दूर करने के लिए कोई मित्र मिल ही जाए।

इतना कहते कहते सर्प महाराज रुक गए, वहां मौजूद सभी लोगों का हुजूम रो रहा था। वो चोर मंडली भी मनुष्यों की ओट लेके आंसू बहा रही थी,

मैं भी रो दिया।  उस पल को बयां नहीं कर सकता मैं। कितनी दुखद दास्तान थी  उस सर्प की।

लेकिन कुछ बायगीरों ने हिम्मत करके पूछा, “महाराज लेकिन आपकी किशोरी से मित्रता कैसे हुई” ?

अब सर्प महाराज ने थोड़ी गहरी सांस ली, और बोलना शुरू किया…………..

एक दिन मैं घूमते घूमते यहीं तुम्हारे खेतों के पास आ गया। वहां तुम्हारी झोंपड़ी खेत के एक पुराने टीले के पास है। उस टीले में ही एक छेद था, मैं वहां रात बिताने के लिए रुका।

मित्र, तुम उस रात काफी देर से आये। मैंने सोचा—सुबह शीघ्र ही मैं यहां से निकल जाऊँगा। रात काफी गहरा चुकी थी। तुम अपने लेटने की तैयारी करने लगे। जब तुम लेटे तो ,तुम ईश्वर भजन गाने लगे। काफी देर तक तुम गाते रहे। शायद ये तुम्हारी आदत में शुमार था। मैं अपने छेद से निकलकर तुमसे कुछ दूरी पर आकर बैठ गया। तुम्हारें ईश्वर भजन को सुनने लगा, मन को एक अजीब सी शान्ति मिली।मैं भाव विभोर हो चुका था, कुछ पल के लिए सारे गम को भूल गया। मुझे उस रात बहुत अच्छा लगा। तुम गाते गाते सो गए, मैं भी अपने छेद में चला गया। सुबह मैं तुमसे शीघ्र उठकर घूमने चला गया। लेकिन मेरा मन कहीं ना लगा। रात को तुम्हारें स्थान पर फिर वापस आ गया,तुम रात को आये, और लेटते ही ईश्वर भजन शुरू कर दिया।कभी कभी बीच में तुम कोई अच्छी कथा का बखान भी करते। मैं फिर से मन्त्र मुग्ध हो गया। यह मेरे भाई का गम करने, भगवान् के प्रति आस्था जगाने, और मन की असीम शान्ति के लिए काफी था।

अब, मैं नहर के आये हुए पानी ( जो गंगा या और नदियों द्वारा खेतों में छोड़ा जाता है)को गंगा का पानी समझ कर नित्य सुबह उसी में स्नान करता और शाम को तुम्हारें भजन सुनकर अपने गम को कम करता।

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