बाद में कालिया भगत ने कहा, “महाराज जी, जिसके बैल हैं, वो एक आदमी है, वह आपका मित्र कैसे हो सकता है” ?
सर्प ने कहा, “पहले मेरे मित्र को बुलाओ, फिर बताऊंगा”
तभी ……………
बायगीरों ने कुछ जानकर ग्रामीणों को बुलाया, और उनमें से दो-तीन आदमियों को सर्प के बताये स्थान पर लगभग तीन-चार कोस दूर दूसरे गाँव में भेज दिया।
शाम हो चली थी पक्षी अपने अपने घर लौटने की तैयारी में लगे थे। अब सूर्य महाराज की ड्यूटी ख़त्म होने को आई थी। वे सारा कामकाज चन्द्र महाराज को समझा रहे थे।
उधर, वहां वो किशोरी भगत अपनी चिंता में डूबा हुआ अपने कार्य में मशगूल था। दो-तीन आदमी ३-४ घंटे का सफ़र करने के बाद किशोरी भगत के घर पहुँच गए, जब उन्होंने सारी बात सिलसिलेवार बताना शुरू किया। तो किशोरी भगत की आँखें फटी की फटी रह गयी। वह आश्चर्यचकित था, एक सर्प मेरा मित्र कैसे हो सकता है ?
उसके मन में कुछ पल में अजीब – अजीब से ख्याल आने लगे, कि कहीं मुझसे कोई भूल तो नहीं हो गयी। लेकिन भूल हुई होती तो वह सर्प मुझसे बदला लेता, मेरा मित्र हरगिज़ नहीं बनता।
उन आदमियों ने टोका तो, वह अपने ख्याल से बाहर आया। अब वह मना कैसे कर सकता था चलने के लिए। सो, उसने उसी समय कपड़े पहने, और निकल पड़ा अपने उस अजनबी मित्र से मिलने। अँधेरा हो चुका था। वो पगडंडियों से होता हुआ चलने लगा उन लोगों के साथ। रास्ता दुर्गम, कंटीली झाड़ियों, नालियों और खड्डों से युक्त था। चलते – चलते , इसी रास्ते पर वह कई बार गिर पड़ा था। बेचारे के कपड़े भी जगह जगह से फट गए ।लेकिन वह इतनी तत्परता से चला जा रहा था, मानो उसके लिए हरिद्वार की यात्री बस खड़ी हो, जो अगर छूट गयी तो उसका तीर्थ अधूरा रह जाएगा।
वह उन आदमियों के साथ चलते-चलते रात लगभग ९ बजे उस स्थान पर पहुंचा, जहाँ पहले से मनुष्यों का हुजूम वहां उसका इंतज़ार कर रहा था। वो उन सभी लोगों को देखकर चौंक गया, जो इस अद्भुत तमाशे का साक्षात्कार करने को डटे हुए थे। अब तो सभी उस किशोरी भगत को ऐसे देख रहे थे, जैसे कोई दूर ग्रह से आया हुआ आदमी हो। उस इकट्ठे हुजूम की बेचैनी इस हद तक बढ़ चुकी थी, कि कोई अपने स्थान को उठने को तैयार नहीं था।
अब चाहे प्यास ही लगे या ‘वो’ सभी अपने अपने स्थान से चिपक गए थे। एक गैस का हंडा जला कर रख दिया गया था बीच में, जो अकेला ही सभी से निर्द्वन्द होकर परिचय पूछ रहा था।
किशोरी भगत को बायगीरों ने आगे कर दिया। जिस फूलन सिंह के ऊपर सर्प महाराज खेल रहे थे,किशोरी भगत उनके सामने पहुंचा। तो महाराज जी ने उसे देखकर प्रणाम किया,और कहा , “मित्र, मुझे मालूम है कि तुम कल रात से बहुत अधिक परेशान हो क्योंकि तुम्हारे बैलों की चोरी हो गयी है।
इतना सुनते ही किशोरी भगत के पैरों टेल जमीन खिसक गई। उसने सोचा , “ आखिर, ये बात इनको कैसे पता चली”।
लेकिन तब तक सर्प महाराज ने दुबारा कहा,“ परेशान ना हो मित्र, पहले तुम पीछे के कमरे में जाकर अपने बैलों को देख लो फिर हम तुम बातचीत करेंगे।
अब किशोरी एक दो लोगों के साथ चल दिया पीछे के कमरे में। जाकर देखा तो वह हक्का – बक्का रह गया।
“ ये तो मेरे ही बैल है, ये कैसी मित्रता है” उसने सोचा।
जब किशोरी लौट के आया तो उसने महाराज जी से कहा “आपने, मुझे इन बैलों को दिलाने के लिए इतनी जहमत क्यों उठाई”।
महाराज जी आपने मुझे मित्र कहा और मित्रता की मिसाल भी कायम कर दी। लेकिन मुझे अभी तक अपने मित्र के विषय में कुछ भी पता नहीं चल सका है।
उसकी आँखों में से आंसुओं की छोटी – छोटी ओसनुमा बूंदे गिरने लगी। उसने आगे कहा, “मैंने अपने जीवन में ऐसा एहसान किसी के साथ नहीं किया, जिसका मुझे इतना बड़ा मान मिले। मैं गरीब, फ़क़ीर,किसी का क्या मित्र बनूँगा”।
महाराज, गरीब का कोई साथी नहीं, कोई मित्र नहीं, मेरा तो गरीबी ही साथी है,
मैंने इसी को अपना मित्र बना लिया है।
कृपया मुझ नासमझ को अपनी कहानी ,एवं मुझसे मित्रता के विषय में बताएं।
इतना सुनने के बाद सभी लोगों की आँखे नाम हो गयी।
तभी सर्प महाराज ने कहा, “चिंता ना करो मित्र, मैं तुम्हें सब बताऊंगा, थोड़ा धैर्य रखों वर्ना मैं भी तुम्हारी तरह अश्रु बहाने लगा तो बताऊंगा कैसे।
अब सर्प महाराज ने अपनी जिंदगी की दास्ताँ इस तरह से बयान की कि वहां उपस्थित सारा जनसमूह आश्चर्य चकित रह गया। उन्होंने एकाग्रता से शून्य की तरफ निहारा मानो अतीत का दर्शन किया हो और बोले……..
मैं और मेरा भाई प्रताप दोनों सर्प के रूप में कई सालों से एक वीरान जगह पर धीरे – धीरे अपना समय काट रहे थे। ये जगह मनुष्यों की नज़रों से सुरक्षित तो थी लेकिन सुकून नहीं था, जो गंगा नदी से काफी दूर भी पड़ता था।
काफी समय बाद हम भाईयों ने सोचा कि इस जन्म से छुटकारा पाने के लिए गंगा किनारे कहीं निवास करेंगे जिससे गंगा स्नान भी करते रहें और अपने ऐसे जीवन का प्रायश्चित भी करते रहें।
मित्रों, सर्प योनि अपने आप में अभिशापित है जिसमें ताउम्र पेट के बल रगड़कर चलना होता है। इस योनि के बैरी भी बहुत हैं। कुछ हैं जो सुरक्षित अपना जीवन काट लेते हैं, १००० वर्षों तक , वे फलस्वरूप इच्छाधारी बन जाते हैं यही उनकी साधना है।
लेकिन सोचिये इतने वर्षों तक पेट के बल चलना ……..खैर, हम दोनों भाई ऐसी धारणा बनाकर गंगा स्नान के लिए उस स्थान को छोड़कर चल दिए। मानव समाज, सर्प भक्षी जानवरों एवं पक्षियों से बचते बचाते हुए फर्रुखाबाद जिले ( उत्तर प्रदेश का एक जिला) के गाँव के नज़दीक पहुँच गए।
शाम का समय था। सभी मजदूर खेतों में से काम करके लौटने की तैयारी में लगे थे। तभी भैया ने कहा , “अब थोड़ा आराम कर लेते हैं, उसके बाद आगे रात में पुनः प्रस्थान करेंगे”।
हम दोनों ने एक सुरक्षित जगह ढूढनी शुरू की। काफी मशक्कत के बाद एक जगह मिल गयी। वहीँ नज़दीक में खेत के किनारे, ऊँची मेड के नीचे, एक छेद था।
उसमें एक में, मैं और दूसरे में मेरा भाई घुस गए और रात के प्रस्थान के बारे में सोचने लगे। अन्दर जाकर वे छेद एक ही जगह मिलते थे। लेकिन हमारा दुर्भाग्य था, वहीँ थोड़ी दूर पर खड़े खेत मालिक ने हमें छेद में घुसते हुए देख लिया था। वह जोर जोर से चिल्लाने लगा।
दौड़ के आओ, अरे ! यहां तो सांप है। देखते – देखते कई आदमी अपने अपने हाथों में लाठियां लिए हुए वहां आ गए।
अब हम दोनों बुरी तरह घबरा गए। हमारे पास बचने का कोई रास्ता न था।
हम दोनों आपस में सोच रहे थे कि हे भगवान् ! गंगा स्नान के स्थान पर हमें मौत मिल रही है, क्या नियति है। इतने में मेरा भाई बोला, “ देख भाई! यदि हम दोनों छेदों में, घुसे रहे तो दोनों मारे जायेंगे। मैंने कहा, “ प्रताप ऐसा करते हैं कि, मैं एक छेद से निकलकर भागूँगा तो भीड़ मेरे पीछे भागेगी। जब ये सब मेरे पीछे दूर निकल जाएँ तो तू सुरक्षित निकल जाएगा।
यदि मैं मारा गया, तो वादा कर मेरे बदले का गंगा स्नान भी कर लेगा और इस जन्म से छुटकारा भी दिला देगा लेकिन तब तक उसने कहा, “देख भाई,
यह काम तो मैं करूँगा” और इतना कहते ही, वह एक छेद से निकल भागा।
अब मेरे पास कोई रास्ता ना बचा था मैं दूसरे छेद से दूसरी तरफ भागा। लोग मेरे भाई के पीछे पागलों की तरह भाग रहे थे और जोर – जोर से चिल्ला रहे थे, “बच के ना जाने पाए”।
ना जाने किस जन्म का बदला हमें चुकाना पड़ रहा था। आखिर ऐसा कौन सा गुनाह किया था हमने यही कि हम गंगा करने आये थे।
उन लोगों ने थोड़ी दूर जाकर मेरे भाई को घेर लिया और ताबड़तोड़ लाठियां भांज दी।
आज मेरा जिगरी दोस्त, भाई सदा के लिए इस दुनिया से चला गया। मैं काफी क्रोध में खड़ा – खड़ा देख रहा था।मैं उन मनुष्यों को भी देख रहा था। बहुत खुश थे वे सब के सब।
सोच रहा था, इन्होने क्या शाबाशी का काम किया है। एक निहत्थे, बेक़सूर पर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है। मैं अभागा बच गया थ। मेरे भाई ने मेरी खातिर कुर्बानी दी थी।
मैंने उपरवाले वाले को बहुत बुरा भला कहा। वो सब लोग मेरे भाई के शरीर को, उस डंडे से लटकाकर गाँव की तरफ ले जा रहे थे। शाबाशी का काम, अब दिखाना भी तो था, गाँव वालों को।
हे ईश्वर ! क्या यही सिला मिलता है इस योनि का, इस शरीर का , वाह ! क्या न्याय है तेरा। मैं बुरी तरह अन्दर ही अन्दर रो रह था। आंसू देखने वाला कौन था मेरे। खैर,तब तक रात का धुंधलका छा चुका था। मुझे अपने भाई की हत्या का दुःख अन्दर ही अन्दर साले जा रहा था।
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