जो कान में खबर पड़ते ही तुरंत उपचार हेतु निकल पड़ते हैं, चाहे उनको कितनी हीं बाधाओं का सामना क्यों ना करना पड़े, मित्रों, आपने मुंशी प्रेमचंद्र की कहानी ‘मन्त्र’ तो पढ़ी ही होगी।
उसमें वो बूढा भगत सर्प के काटे जाने की खबर सुनने के बाद से, अपने आप को रोकने की बहुत कोशिश करता है लेकिन रोक नहीं पाता, और उसे उस लड़के का इलाज़ करने जाना पड़ता है, जहाँ तक मैंने सुना और पूछा हैं इन बायगीरों से ,ये बायगीर, भगत जो मन्त्र, झाड़ फूंक करते हैं।
इनको गुरु और मन्त्रों की आन लगी होतीं है, यदि एक बार सर्प के काटे जाने की खबर कानों में पड़ गयी,उसी पल इनको जाना पड़ेगा, अब चाहे दिन हो, या रात। यदि वो इससे छुटकारा पाना चाहे तो किसी को अपना शिष्य बनाकर उसे ये विद्या सिखा दें। फिर वो इस बंधन से कुछ हद तक मुक्त हो सकते हैं, अब शिष्य पर भी यही बात लागू होती है।
फूलन सिंह की माता हरि प्यारी एवं पत्नी शांति देवी बहुत अधिक भयभीत थी, अब उन्हें भविष्य की चिंता सताए जा रही थी, वे अपने बेशकीमती आंसुओं को निरंतर बहाए जा रही थी, बच्चे भी अपने पिता की हालत को देखकर, अपने कोमल नवीन आंसुओं को बहा लेते और हाथ के बाजुओं से पोंछ लेते थे।
पास खड़े सभी स्त्री पुरुष उनको समझा रहे थे। तब तक पास से, दूर से, भगत-बायगीर अपनी मंडलियों के साथ टोलियों के रूप में आ गए।
उन्होंने फूलन सिंह को नीम के पत्तों के ढेर में से निकालकर चौकी के समीप आसन पर बिठा लिया, उसको सफ़ेद चादर से ढंक दिया।
जिसके दोनों तरफ 4 – 5 युवक उसे उठने से रोकने के लिए बैठ गए। सफ़ेद चादर को इसलिए डाला जाता है, ताकि उस व्यक्ति की विषहरण प्रक्रिया निर्बाध चलती रहे, और सभी उस व्यक्ति के वीभत्स चेहरे को ना देख सकें।
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