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इसपर हनुमानजी बोले- प्रभु आपका बाण तो मरने के बाद सबको आपके पास लाता है पर भरतजी का बाण तो जिन्दा ही आपके चरणों में लेकर आता है. उनके बाण पर बैठकर मैं आपके पास पहुंचा. भरत जी संत है.

हनुमानजी बोले- प्रभु मेरे मन को पुनः अभिमान ने घेरा, भला बाण मेरा भार उठा सकेगा? परंतु भरतजी ने तो पर्वत सहित मुझे अपने बाण पर बिठाकर पहुंचा दिया क्योंकि उन्होंने बाण साधने से पहले आपका स्मरण किया और आपकी शक्ति के हवाले कर दिया था.

प्रभु संजीवनी लाने के कार्य के लिए आपने मुझे आदेश देकर मेरा यह जीवन सफल कर दिया. रामनाम अनुराग का है, विश्वास का है. हृदय से लें तो इसके बाद किसी चीज की आवश्यकता ही नहीं. नहीं तो सारा भ्रमजाल ही है.

सियापति रामचंद्र की जय! पवनसुत हनुमान की जय!!
(रामचरित मानस का प्रसंग)

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