गरूड़ पुराण में पांच विशेष प्रकार की प्रेत योनि के बारे में कहा गया है. प्रेतयोनि किसी को मिलती क्यों है? प्रेत योनि का निर्धारण कैसे होता है? प्रेत क्या खाते हैं,कैसे खाते है? पांत प्रेतों से कैसे बचें.
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गृहस्थ को प्रेत योनि मिलने के पांच मुख्य कारण हैं. वे कारण ही प्रेत योनि के लक्षण भी हैं. प्रेत का मुख सुई के छेद जैसा होता है. प्रेत भोजन को तरसते हैं, बासी भोजन पर ही उनका अधिकार होता है. बहुत तेजी से उड़ते हैं. लोभ में संग्रह कर सकते हैं पर उसका उपभोग नहीं. ऐसी बातें आपने प्रेतों के बारे में आपने सुनी होगी.
गरूड़ पुराण में एक सुंदर कथा है इस बारे में. प्रेत योनि किसी को क्यों मिलती है. प्रेत योनि को भोगना कैसे पड़ता है. प्रेत योनि में आहार क्या होता है. प्रेत योनि से उद्धार कैसे होता है, आदि आदि.. गरूड़ पुराण में मुख्य रूप से तो आत्मा के परलोक गमन और उसके फल निर्धारण की कथा ही है.
किसी की स्मृति में उसके देहांत के बाद गरूड़ पुराण की कथा की परंपरा है. आप धैर्य से इस कथा को पढ़िएगा. गृहस्थों के लिए जानकारी की बातों से भरी पड़ी है कथा. प्रेत योनि के बारे में बहुत कुछ जान जाएंगे. कथा गरूड़ जी के एक प्रश्न से शुरू होती है.
गरूड़ और भगवान श्रीकृष्ण के बीच संवाद के बीच ज्ञानचर्चा ही गरूड़ पुराण है.
गरूड़ ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा- भगवन कोई ऐसी कथा सुनायें जो अद्भुत हो, ज्ञानप्रद हो और उसमें आपकी महिमा भी निहित हो.
श्रीकृष्ण ने कहा- गरूड़ तुम्हारे अनुरोध पर मैं एक कथा सुनाता हूं. कथा बहुत रोचक और सामान्य धर्मकथाओं से अलग है. इसमें मेरी भी भूमिका है. इससे तुम्हें प्रेत योनि के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलेगा. कथा को ध्यान से सुनना और समझना. मनुष्य अगर इसे समझ ले तो वह कभी प्रेत ही न हो.
भगवान ने कथा सुनानी शुरू की.
प्राचीन काल में संतप्तक नामका विद्वान ब्राह्मण ने घोर तपस्या से की. पापमुक्त और निर्मल ज्ञान प्राप्ति के बाद वह वन में रहने लगा. उसने सोचा कि सारा जीवन तपस्या में बीत गया. मैंने तो कभी तीर्थयात्रा की ही नहीं. इसके बिना तो जीवन अधूरा है. इस विचार से वह तीर्थों के दर्शन को चल पड़ा. वह कभी अपने आश्रम या क्षेत्र से बाहर नहीं गया था इसलिए मार्ग भूल गया.
दोपहर हो गयी. स्नान की इच्छा से वह सरोवर की खोज करता घने जंगल में पहुंच गया. वन इतना घना था कि उसमें पक्षियों तक के लिए भी मार्ग कठिन था. हिंसक जीव-जन्तु, पिशाचों और राक्षसों से भरा पडा था वन. डरावने वन को देखकर वह भयभीत तो था, पर जल और फल की खोज में भीतर घुस गया.
कुछ ही कदम चला था कि बरगद के वृक्ष की एक शाखा से लटकता शव दिखाई दिया. शव को पांच भयानक प्रेत बडे वीभत्स तरीके से खा रहे थे. प्रेत भी कुछ कम डरावने नहीं थे. प्रेतों के शरीर में हड्डी, धमनियां और चमड़ा ही शेष था. पेट, पीठ में धंसा हुआ था. शव अभी ताजा ही लग रहा था.
संतप्तक को तो जैसे काठ मार गया. वह जड़वत खड़ा रह गया. उसका दुर्भाग्य कि प्रेतों ने उसे देख लिया और उसकी ओर दौड पडे़. प्रेतों ने उसे पकड़ लिया और इस बात पर झगड़ने लगे कि इसे कौन खाएगा.
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एक प्रेत अचानक संतप्तक को लेकर आकाश में उड़ चला. दूसरों ने उसका पीछा किया. सहजता से हाथ आए ताजे भोजन को कोई छोड़ना नहीं चाहता था. संतप्तक को लेकर वे आकाश में चले गये किन्तु बरगद पर लटका शव भी बहुत बासी नहीं था. इसलिए उसका शेष मांस खाने की भी उनकी इच्छा थी.
प्रेत लटके हुए शव के पास आए. उस शव को पैरों में बांधकर फ़िर से आकाश में उड गये. भयभीत संतप्तक ने मेरा (श्रीकृष्ण) स्मरण किया. वह इस स्थिति में भी निरंतर मेरी स्तुति कर रहा था.
प्रार्थना सुनकर मैं वहां पहुंच गया. मैं संतप्तक की सहायता करना ही चाहता था कि मुझे भी कुछ कौतूहल हुआ. मैं अब चुपचाप प्रेतों के पीछे चलने लगा कि आखिर वे चाहते क्या हैं. जब प्रेत सुमेर पर्वत के पास पहुंचे तो वहां मुझे मणिभद्र नामक यक्ष मिला.
मैंने मणिभद्र से कहा कि तुम रूप बदलने में प्रवीण हो. यक्षराज इन प्रेतों की ऐसी प्रजाति बन जाओ जो इनसे बलवान हो, इन्हें परास्त कर सके. फिर इन्हें युद्ध की चुनौती देकर शव को ले भागो.
मणिभद्र ने मेरे आदेश पर उन्हें युद्ध को ललकारा. प्रेतों ने पारियात्र पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर ब्राह्मण को उतारा फिर पलटकर मणिभद्र की ओर आए. उन्होंने मणिभद्र को चारों ओर से घेर लिया पर यक्षराज तब तक अदृश्य हो गया.
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प्रेतों ने उसे बहुत ढूंढा पर वह न मिला. वह मेरा कहा कार्य कर चुका था. पांचों प्रेत वापस पर्वत की छोटी पर पहुंचे और ब्राह्मण को मारने लगे. मारना आरंभ ही किया कि वहां मेरी उपस्थिति तथा संतप्तक के तप के प्रभाव से उन्हें पूर्वजन्म की स्मृति हो उठी.
प्रेत रुक गए और ब्राह्मण की प्रदक्षिणा कर क्षमा मांगते हुए कहा- हे, विप्रदेव वृति तो हमारी बड़ी बुरी है पर आप हमें क्षमा कर दें.
प्रेत संतप्तक के पैरों में लोटकर तो कभी उसकी प्रदक्षिणा करके क्षमा मांगने लगे. ब्राह्मण को घोर आश्चर्य हुआ.
उसने कहा- आप लोग कौन हैं ? क्या मैं कोई सपना देख रहा हूं या यह मेरे मन का भ्रम है. मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूं. आप पहले तो मेरे साथ दुर्व्यवहार कर रहे थे, अचानक विनय भाव दर्शाने लगे. अचानक इस बदले व्यवहार का क्या कारण है?
प्रेतों ने कहा हम सब प्रेत हैं. पूर्वजन्म में अपने पापों के चलते हमें यह योनि भोगनी पड़ रही है. हमारे नाम पर्युषित, शुचिमुख, शीघ्रग, रोधक और लेखक हैं.
संतप्तक ने कहा- तुम्हारे नाम बड़े विचित्र हैं. ये निरर्थक नहीं हो सकते. इन नामों के पीछे कोई न कोई तो कारण अवश्य है. मुझे इसका रहस्य बताओ.
प्रेतों ने कहा कि हे पापरहित ब्राह्मणश्रेष्ठ आपके दर्शन से हम सभी निष्पाप हो गये. इसीलिये हमें हमारे पूर्वजन्मों की स्मृति हो आयी है. हम अपने पूर्वजन्मों के अपने कुकृत्यों और अपने विचित्र नामों का रहस्य आपको अवश्य बतायेंगे.
प्रेतों ने बारी बारी से बताना आरंभ किया. सबसे पहले पर्युषित बोला.
आप विद्वान हैं अत: यह तो जानते ही हैं कि पर्युषित बासी भोजन को कहते हैं. मैने श्राद्ध के समय एक ब्राह्मण का अपने घर न्योता दिया था. ब्राह्मण बहुत वृद्ध था. मार्ग में धीरे धीरे चलने के कारण कुछ विलंब से मेरे घर पहुंचा.
मुझे सुबह से ही भूख लग रही थी. मैं अपनी भूख को सह नहीं पाया. मैंने न तो ब्राह्मण की प्रतीक्षा की, न ही कोई श्राद्ध कार्य किया. भूख से बेचैन होकर मैंने श्राद्ध हेतु बने भोजन को चुपके से खा लिया.
विलंब से पहुंचे ब्राह्मण के लिए कुछ भी नहीं बचा था. मैंने चालाकी से पर्युषित यानी बासी भोजन उसे खिला दिया. जानबूझ कर किए इसी पाप से मुझे इस प्रेत योनि की प्राप्ति हुयी. ब्राह्मण को पर्युषित भोजन देने के कारण मेरा यह नाम पडा.
दूसरा प्रेत शुचिमुख बोला- मैं उस समय एक बलिष्ठ क्षत्रिय युवक था. एक ब्राह्मणी अपने पांच वर्षीय एकलौते पुत्र के साथ तीर्थस्नान का लाभ लेने भद्रवट गयी. मैं बड़ा दबंग और लुटेरा था. रास्ते चलते लोगों का सामान छीन लिया करता था.
मैंने उस ब्राह्मणी के लडके को जोर का घूंसा मारा. दोनों के वस्त्र और खाने का सामान छीन लिया. सर पर वार से चकराया लडका अपनी माता से लेकर जल पीने लगा तो मैंने डपट दिया.
भयानक डपट सुनकर वह बालक भय से बुरी तरह सहम गया. मैंने उसका जलपात्र उससे छीन लिया. उसमें थोडा सा ही जल बचा हुआ था. सारा जल मैंने ही पी लिया. इस तरह डर और प्यास से व्याकुल उस बालक की कुछ ही देर में मृत्यु हो गयी.
अपनी आंखों के सामने अपने प्यारे पुत्र को दम तोड़ते देख उसकी मां ने भी पास के कुएं में कूदकर जान दे दी. हे ब्राह्मणश्रेष्ठ इस पाप से मैं प्रेत बना. इस पाप के चलते पहाड़ जैसा शरीर होने पर भी मेरा मुख सुई की नोक के बराबर ही है.
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मैं बलवान हूं. छीन झपटकर भोजन आसानी से प्राप्त कर लेता हूं. पर सुई के छेद जैसे मुख से उसको खाने में असमर्थ हूं. भूख से व्याकुल बालक का भोजन छीनकर मैंने उसका मुंह बन्द किया था. इससे मेरा मुंह सुई के नोक जैसा हुआ और मुझे शुचिमुख कहते हैं.
अब शीघ्रग बोला- मैं तो एक धनवान वैश्य था. कारोबार के लिए देश-परदेश की यात्रा करता ही रहता था. एक बार अपने एक घनिष्ठ मित्र के साथ व्यापार करने दूसरे देश को गया.
दुर्भाग्य से इस यात्रा में व्यवसाय मेरे मन के अनुसार नहीं हुआ. हर जगह घाटा ही हुआ. स्थिति ऐसी भी आयी कि मेरा धन समाप्त हो चुका था. मेरे मित्र के पास बहुत धन था. मेरे मन में उस धन के लिए लोभ आ गया.
एक बार हम दोनों नाव से एक नदी से एक स्थान से दूसरे स्थान को जा रहे थे . जल मार्ग लंबा और नदी विशाल और गहरी थी. मेरा मित्र थककर सो गया. लालच से मेरी बुद्धि क्रूर हो उठी थी. मैंने उचित अवसर भांपकर अपने मित्र को नदी में धकेल दिया.
नाविक सहित कोई भी इस बात को न जान सका. मित्र के हीरे, जवाहरात सोना आदि लेकर मैं अपने देश लौट आया. सारा सामान अपने घर में रखकर मैंने मित्र की पत्नी से जाकर कहा कि मार्ग में डाकुओं ने प्यारे मित्र को मारकर सब सामान छीन लिया.
मैं बहुत दुःखी हूं और किसी तरह से जान बचा कर भाग आया हूं. मेरे मित्र की पत्नी ने अपने पति के वियोग में आग लगाकर जान दे दी. मैं बाधाविहीन हो, प्रसन्न मन घर लौट आया. जीवनभर उस धन का उपभोग किया, आनंद लूटा.
पर जब मैं मरा तो मेरा यह पाप साथ आया. मित्र को नदी में फेंककर शीघ्र घर लौट आया, उसके कारण मुझे प्रेत योनि भुगतने का दंड मिला. उस प्रकरण के चलते मेरा नाम शीघ्रग हुआ.
रोधक बोला- हे विप्रवर, मैं शूद्र जाति का था. राजा और राज्य की अच्छी सेवा के बदले राजा से मुझे उपहार में सौ गांव मिले थे. मेरे परिवार में वृद्ध माता पिता और एक छोटा सगा भाई था. लोभ से मैंने भाई को अलग कर दिया.
मेरे पास अपार धन था जबकि भाई, भोजन वस्त्र की कमी से दुखी रहने लगा. उसे दुखी देख माता पिता मेरे मना करने पर भी मुझसे छिपाकर उसकी सहायता कर देते थे. कभी वस्त्र देते तो कभी भोजन और अन्न.
जब मुझे यह बात पता चली तो क्रोधित होकर मैंने माता पिता को जंजीरों से बांधकर एक सूने घर में डाल दिया. अकेलेपन और कष्ट से कुछ दिन बाद वे वहीं जहर खाकर मर गए. माता-पिता के मरने से छोटे भाई के पास कोई सहारा न रहा.
छोटा भाई भी भूख से व्याकुल इधर उधर भटकता हुआ मर गया. इस पाप से मुझे यह प्रेत योनि मिली. अपने माता पिता को बन्दी बनाने और रोक कर रखने के कारण मेरा नाम रोधक पडा.
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लेखक बोला- मैं उज्जैन का ब्राह्मण था. लोग मेरी प्रतिष्ठा मानते थे क्योंकि मैं वहां के प्रसिद्ध और संपन्न मन्दिर का पुजारी था. राजा भी कभी-कभी उस मंदिर में पूजा को आते. उस मन्दिर में सोने की बनी और रत्न से जडी हुई बहुत सी मूर्तियां थीं.
उन रत्नों को देखकर मेरे मन में पाप आ गया. मैंने नुकीले लोहे से मूर्ति के नेत्रों से चमकते रत्न निकाल लिए. क्षत-विक्षत और नेत्रहीन विरूपित मूर्ति बहुत ही विकृत दिखने लगी. संयोग से अगली ही सुबह राजा उसी मंदिर में पूजा करने आ गया.
मैं इस घटना से अनभिज्ञता जताते हुये वहीं पर था ही. आखिर मुझ पर किसी को कहां शंका होती. विकृत, विरूपित अंधी देव मूर्तियां देख राजा क्रोध से तमतमा उठा.
राजा ने अपनी अंजुली में जल उठाकर प्रतिज्ञा की कि जिसने भी चोरी की है वह श्रेष्ठ ब्राह्मण ही क्यों न हो, उसको प्राणदंड देगा. यह सुनकर मैं बुरी तरह डर गया. मैंने रात में चुपके से राजा के महल में जाकर तलवार से उसका सिर काट दिया.
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चोरी के सामान के साथ मैंने उज्जैन छोड़ चल दिया. होने की किसे पता! कोई नहीं जानता उसकी मृत्यु कैसे होनी है. रास्ते में जंगल पड़ा. वहां बाघ ने मुझे मार डाला. नुकीले लोहे से प्रतिमा को छेदने और काटने का कार्य करने के कारण मैं नरक भोगने के बाद लेखक नामक प्रेत हुआ.
ब्राह्मण ने कहा- मैं समझ गया कि तुम्हारे दुष्कर्मों के अनुसार ही तुम्हारे नाम पड़े हैं. मैं तुम सबके आचरण और आहार के बारे में जानना चाहता हूं.
प्रेतों ने बताया- जिस घर में श्राद्ध तर्पण, भक्ति-पूजा नहीं होती, अशौच, अशुद्धि रहती है. हम उसके शरीर से मांस और रक्त चूसकर उसे पीड़ित करते हैं. मांस खाना, रक्त पीना ही हमारा आचरण है. मल और विभिन्न अभक्ष वस्तुएं ही हमारा भोजन है.
हम सब अज्ञानी, तामसी और मन्दबुद्धि हैं. जाने कैसे अचानक ही हमें अपने पूर्वजन्म की स्मृति हो गई. हमने कैसा व्यवहार किया, क्यों किया, हम यह नहीं जानते.
कथा सुनाकर श्रीकृष्ण गरूड़ से बोले- प्रेतों का वार्तालाप पूरा होते ही मैंने उन्हें दर्शन दिया. ब्राह्मण ने मेरी अर्चना कर प्रेतों के उद्धार की प्रार्थना की. मैंने ब्राह्मण और प्रेतों का उद्धार करते हुए ब्राह्मण संतप्तक समेत पांचों प्रेतों को भी अपने लोक में वास दिया.
प्रभु ने कहा- कर्मों के अनुसार दंड भोगना ही पड़ेगा. निकृष्ट कर्म करने वाला दंड से बच नहीं सकता. अज्ञानतावश उसे भ्रम होता है कि उसका पाप गुप्त रहेगा. फिर दैवयोग से उसमें भक्तिभाव जाग्रत होने के बाद ही उसका कल्याण होता है.
यदि मनुष्य अपना कल्याण चाहता है तो उसे पापों से दूर रहना चाहिए. यदि अज्ञानतावश कोई पाप हो जाए तो उसका तुरंत पश्चाताप करे अन्यथा उसे इस जन्म और अगले जन्म में इन पापों का कई गुणा दंड भोगना पड़ता है.
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