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पहला राजकुमार बोला-“ पिताजी मैंने नाशपाती का पेड़ अपने राज्य में ही खोज निकाला. वह तो बिलकुल टेढ़ा-मेढ़ा और सूखा हुआ था.”
बड़ा राजकुमार अभी बोल ही रहा था कि दूसरे राजकुमार ने बीच में ही टोक दिया.
बात काटते हुए वह बोल पड़ा, “नहीं-नहीं नाशपाती का पेड़ को मैंने भी अपने राज्य में खोज निकाला लेकिन पेड़ तो बिलकुल हरा–भरा था. हां एककमी दिखी. उस वृक्ष में एक भी फल नहीं लगा था.
दोनों बड़े भाइयों की बात सुनकर सबसे छोटे राजकुमार से धैर्य न रखा गया.
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वह भी बीच में बोल पड़ा, “भैया, लगता है आप दोनों ही कोई गलत पेड़ देख आए क्योंकि मैंने सचमुच नाशपाती का पेड़ देखा. वह बहुत ही शानदार था और फलों से लदा पड़ा था.”
इसके बाद तीनों राजकुमार अपनी-अपनी बात को लेकर आपस में विवाद करने लगे. तीनों ने नाशपाती का पेड़ देखा था. वे सही वर्णन कर रहे थे इसलिए झुकने का प्रश्न ही नहीं था.
विवाद बढ़ता देख राजा अपने सिंहासन से उठे और बोले, “ पुत्रों, तुम्हें आपस में बहस करने की कोई आवश्यकता ही नहीं. दरअसल तुम तीनों ही नाशपाती के वृक्ष का सही वर्णन कर रहे हो. मैंने ही जानबूझ कर तुम्हें अलग-अलग मौसम में वृक्ष खोजने भेजा था. तुमने जो देखा वह उस मौसम के अनुसार था. जिस मौसम में वृक्ष जैसा होता है वैसा तुम्हें दिखा.
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ऐसा करने के पीछे मेरा एक बड़ा उद्देश्य था. मैं तुम लोगों को एक व्यवहारिक बात सिखाना चाहता था. जो मैं कहने जा रहा हूं उसे वह ध्यान से सुनना. मेरी इस बात में मेरे पूरे जीवन के अनुभव का निचोड़ है इसलिए तुम मेरी तीन बातों को गांठ बाँध लो-
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उपरोक्त कथा शिक्छाप्रद है.