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विधि विधान से श्रीपंचमी का व्रत करता है. वह अपने इक्कीस कुलों के साथ लक्ष्मी लोक में निवास करता हैं. जो सौभाग्यवती स्त्री इस व्रत को करती है, वह सौभाग्य, रूप, सन्तान और धन से सम्पन्न हो जाती हैं तथा पति को अत्यंत प्रिय होती है.

ऐसा कहकर देवगुरु बृहस्पति ने देवराज इंद्र को श्रीपंचमी-व्रत की विधि पूरे विधान को समझाकर बतलाया. इंद्र ने भी श्रीपंचमी-व्रत का पूरे विधि-विधान का विधिवत आचरण करते हुए पूर्ण पारण किया.

इंद्र को व्रत करते देखकर सभी देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, विद्याधर, नाग, ब्राह्मण, ऋषिगण तथा राजागण तो क्या सामान्य जन भी यह व्रत करने लगे.

कुछ काल के बाद व्रत समाप्त कर सबने जब एक बार फिर गुरु बृहस्पति से पूछ लक्ष्मीजी मैंने पूर्ण विधि विधान से किया है अवश्य प्रसन्न होंगी क्योंकि हमें उत्तम बल और तेज की प्राप्ति का अनुभव हो रहा है. अब आगे क्या करना होगा.

गुरु वृहस्पति ने कहा- आप सब भगवान श्री विष्णु के पास जाए. लक्ष्मीजी क्षीर सागर में विघटित हो गयी हैं वे उसमें उसी तरह मिल गयीं हैं जैसे दधि में माखन.

सब भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा कि विघटित हो जाने की दशा में उनको फिर से प्राप्त करने का मात्र एक ही उपाय है. क्षीर सागर का मंथन. परंतु इस कार्य में दैत्यों को भी साथ लेना होगा.

सबका विचार बना कि समुद्र को मथकर लक्ष्मी और अमुत को ग्रहण करना चाहिये. दैत्य भी लक्ष्मी के जाने से बहुत दुःखी थी वे भी इस बात पर सहमत हो गये.

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