May 3, 2026

श्रीमद्भगवद्गीता प्रथम अध्यायः अर्जुन विषाद योग

।।प्रथम अध्यायः अर्जुन विषाद योग।। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निमित्त बनाकर समस्त विश्व को गीता के रूप में जो महान् उपदेश दिया है, यह अध्याय उसकी प्रस्तावना है। इसमें…

श्रीमद्भगवद्गीता दूसरा अध्यायः सांख्य योग

दूसरा अध्यायः सांख्य योग पहले अध्याय में दोनों सेनाओं की स्थिति, महारथियों का परिचय, शंखध्वनि के बाद श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करने की…

श्रीमद्भगवद्गीता तीसरा अध्यायः कर्म योग

तीसरा अध्याय – कर्म योग (कर्म-योग और ज्ञान-योग का भेद) दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने श्लोक 11 से श्लोक 30 तक आत्मतत्त्व समझाकर सांख्ययोग का प्रतिपादन किया। बाद में…

श्रीमद्भगवद्गीता चौथा अध्यायः ज्ञान कर्म संन्यास योग

चौथा अध्याय – ज्ञान कर्म संन्यास योग (कर्म-अकर्म और विकर्म का निरुपण) तीसरे अध्याय के श्लोक 4 से 21 तक में भगवान ने कई प्रकार के नियत कर्मों के आचरण…

श्रीमद्भगवद्गीता पाँचवा अध्यायः कर्म संन्यास योग

पाँचवां अध्यायः कर्म संन्यास योग (सांख्य-योग और कर्म-योग के भेद) अर्जुन उवाच संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌ ॥ (१) भावार्थ : अर्जुन ने…

श्रीमद्भगवद्गीता छठा अध्यायः आत्म संयम योग

छठा अध्याय – आत्म संयम योग (योग में स्थित मनुष्य के लक्षण) श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ (१)…

श्रीमद्भगवद्गीता सातवां अध्यायः ज्ञान विज्ञान योग

सातवां अध्याय – ज्ञान विज्ञानं योग (विज्ञान सहित तत्व-ज्ञान) श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ (१) भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे पृथापुत्र!…

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय आठः अक्षर ब्रह्मं योग

अध्याय आठः अक्षर ब्रह्मं योग (अर्जुन के सात प्रश्नो के उत्तर) अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ (१) भावार्थ : अर्जुन ने पूछा…

श्रीमद्भगवद्गीता नवां अध्यायः राजविद्या राजगुह्य योग

नवां अध्यायः राजविद्या राजगुह्यः योग (सृष्टि का मूल कारण) श्रीभगवानुवाच इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ॥ (१) भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे…

श्रीमद्भगवद्गीता दसवां अध्यायः विभूति योग

दसवां अध्यायः विभूति योग (भगवान की ऎश्वर्यपूर्ण योग-शक्ति) श्रीभगवानुवाच भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः । यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥ (१) भावार्थ : श्री भगवान्‌ ने कहा –…

श्रीमद्भगद्गीता ग्यारहवां अध्यायः विश्वरूप दर्शन योग

ग्यारहवां अध्यायः विश्वरूप दर्शन योग (अर्जुन द्वारा विश्वरूप के दर्शन के लिये प्रार्थना) अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम्‌ । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ (१) भावार्थ : अर्जुन ने…

श्रीमद्भगवद्गीता बारहवां अध्यायः भक्तियोग

बारहवां अध्यायः भक्तियोग (साकार और निराकार रूप से भगवत्प्राप्ति) अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ (१) भावार्थ : अर्जुन ने पूछा –…

श्रीमद्भगवद्गीता तेरहवां अध्यायः क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग

 तेरहवां अध्यायः क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय) अर्जुन उवाच प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च । एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥ (१) भावार्थ : अर्जुन ने पूछा –…

श्रीमद्भगवद्गीता चौदहवां अध्यायः गुणत्रय विभाग योग

चौदहवां अध्यायः गुणत्रय विभाग योग (प्रकृति और पुरुष द्वारा जगत्‌ की उत्पत्ति) श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌ । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ (१) भावार्थ : श्री…

श्रीमद्भगवद्गीता पंद्रहवां अध्यायः पुरुषोत्तम योग

पंद्रहवां अध्यायः पुरुषोत्तम योग (संसार रूपी वृक्ष का वर्णन) श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ॥ (१) भावार्थ : श्री भगवान ने कहा –…

सोलहवां अध्यायः देव-असुर संपदा विभाग योग

सोलहवां अध्यायः देव-असुर संपदा विभाग योग (दैवीय स्वभाव वालों के लक्षण) श्रीभगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌ ॥ (१) भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे…