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इससे पहले कि वह कुछ कहता, नारदजी बोल पड़े भगवान ने कहा है- तुम्हारे अभी कई जन्म संतान होने का योग नहीं है.
इस पर वह व्यक्ति हँस पड़ा. उसने अपने पुत्र को बुलाकर नारदजी के चरणों में डाला और कहा- एक महात्मा के आशीर्वाद से यह पुत्र उत्पन्न हुआ है.
नारद को भगवान पर बड़ा क्रोध आया कि व्यर्थ ही वह झूठ बोले. यदि मुझे आशीर्वाद देने की आज्ञा दे देते तो मेरी प्रशंसा हो जाती. वह तो किया नहीं, उलटे मुझे झूठा और उस दूसरे महात्मा से भी छोटा सिद्ध कराया.
नारद कुपित होते हुए विष्णुलोक में पहुँचे और कटु शब्दों में भगवान से अपने मन की बात कह डाली.
भगवान ने नारद को सान्त्वना दी और कहा कि तुम्हें इसका उत्तर कुछ दिनों बाद दूंगा. नारद वहीं ठहर गए. बोला उत्तर लेकर ही जाउंगा.
एक दिन भगवान ने कहा- नारद लक्ष्मी बीमार हैं. उसकी दवा के लिए किसी भक्त का कलेजा चाहिए. तुम जाकर किसी से माँग लाओ.
नारद लोक-लोक घूमते रहे लेकिन लक्ष्मीजी के लिए अपना कलेजा देने वाला न मिला. अन्त में उस महात्मा के पास पहुँचे जिसके आशीर्वाद से पुत्र हुआ था.
उसने भगवान की आवश्यकता सुनते ही तुरन्त अपना कलेजा निकालकर दे किया. उसकी मृत्यु हो गई.
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