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शत्रु यदि वीर है तो उसकी वीरता का भी होना चाहिए पूरा सम्मानः आज के गीता ज्ञानअमृत में प्रथम अध्याय के श्लोक 5 व 6 का दर्शन

शत्रु यदि वीर है तो उसकी वीरता का भी होना चाहिए पूरा सम्मानः आज के गीता ज्ञानअमृत में प्रथम अध्याय के श्लोक 5 व 6 का दर्शन

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“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”।।

श्रीमद् भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के प्रारंभिक श्लोकों में युद्ध आरम्भ होने से पूर्व के “दुर्योधन-द्रोण संवाद” का वर्णन है, जिसे सुनने की इच्छा धृतराष्ट्र ने व्यक्त की है।

श्लोक संख्या एक से छह में दुर्योधन द्वारा पांडव सेना का निरीक्षण और पांडव सेना के वीर योद्धाओं का बखान है.

कल तक हमने प्रथम अध्याय के एक से चार श्लोकों तक की व्याख्या और उसका दर्शन समझने की कोशिश की.

आज श्लोक संख्या पांच एवं छह में दुर्योधन द्वारा पांडव पक्ष के कई अन्य ऐसे वीरों का बखान देखेंगे.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

श्लोक- 5 एवं 6

धृष्तकेतुश्चेकितान काशिराजस्च वीर्यवान।
पुरुजितकुन्तिभोजश्च शैव्यस्च नरपुंगवः।।5।।

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।।6।।

सरलार्थः दुर्योधन द्रोणाचार्य को पांडव सेना का परिचय देते हुए कहता हैः

इसमें धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, पुरुजित, कुंतिभोज और शैव्य जैसे श्रेष्ठ वीर हैं तो पराक्रमी युधामन्यु, बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी के पांचों पुत्र मनुष्यों में श्रेष्ठ वीर हैं.

भावार्थ-
पांडवों की तरह दुर्योधन भी गुरू द्रोण का शिष्य है और अत्यंत बलशाली तथा युद्ध नीतियों का जानकार है.

उसने अपने पक्ष के वीरों की शक्ति को पहचानकर ही पांडवों से युद्ध का निर्णय किया था. उसकी सेना में भी ऐसे-ऐसे महारथी हैं जिनसे युद्ध का साहस देवताओं की सेना के लिए भी आसान नहीं.

फिर भी वह एक कुशल योद्धा के समान दुर्योधन अपने शत्रु की सेना का आंकलन कर रहा है. दुर्योधन शत्रुओं की वीरता का बखानकर द्रोणाचार्य को पूरे सामर्थ्य से युद्ध के लिए उसका रहा है.हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

गीता का संदेशः

गुणवान व्यक्ति वही है जो दूसरों के गुणों को परखकर उसका सम्मान करता है. यदि आपका शत्रु वीर है, तो उसकी वीरता का भी सम्मान होना चाहिए.

दुर्योधन पांडव सेना को पराजित कर उसका अंत करने देने को आतुर है लेकिन युद्ध आरंभ होने से पहले वह शत्रुपक्ष के वीरों का बखान कर रहा है.

श्रीकृष्ण का संदेश है कि विनाशकारी युद्ध से जहां तक संभव हो बचना चाहिए, परंतु यदि युद्ध अवश्यंभावी हो गया हो तो उसे अपना कर्म समझकर पूरे सामर्थ्य व मनोयोग से पूर्ण करना चाहिए.

संकलन व प्रबंधन: प्रभु शरणम् मंडली

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