[sc:fb]
कनकधारा स्तोत्र का हिंदी रुपांतरणः
जिस प्रकार भ्रमरी अर्ध विकसित पुष्पों से अलंकृत तमाल वृक्ष का आश्रय ग्रहण करती है, उसी प्रकार भगवान श्री विष्णु के रोमांच से शोभयमान लक्ष्मी की कटाक्ष लीला श्री अंगों पर अनवरत पड़ती रहती है और जिसमें समस्त ऐश्वर्य-ध-संपत्ति का निवास है। वह समस्त मंगलों की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी की कटाक्ष-लीला मेरे लिए मंगलदायिनी हो।
जिस प्रकार भ्रमरी कमलदल पर मंडराती है अर्थात बार-बार आती जाती रहती है उसी प्रकार भगवान मुरारी के मुखकमल की ओर प्रेम सहित जाकर और लज्जा से वापस आकर समुद्र-कन्या लक्ष्मी की मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे अतुल श्री ऐश्वर्य प्रदान करें।
जो समस्त देवों के स्वामी इन्द्रपद के वैभव का विलास अर्थात सुखोपभोग प्रदान करने में समर्थ है तथा मुर नामक दैत्य के शुत्र भगवान श्री हरि को भी अत्यंत आनंद प्रदान करने वाली है एवं नीलकमल जिस लक्ष्मी का सहोदर भ्राता है ऐसी लक्ष्मी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि किंचित क्षण के लिए मुझ पर थोड़ी अवश्य पड़े।
जिसकी पुतली एवं भौंहें काम के वशीभूत हो अर्ध विकसित एकटक नयनों को देखने वाले आनंदकंद सच्चिदानंद भगवान मुकुन्द को अपने सन्निकट पाकर किंचित तिरछी हो जाती है। ऐसे शेषशायी भगवान विष्णु की अर्द्धंगिनी श्री लक्ष्मी जी के नेत्र हमें प्रभूत धन-संपत्ति प्रदान करने वाले हों।
जिन भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि से वशीभूत वक्षस्थल में इन्द्रनीलमय हारावली के समान सुशोभित होती है तथा उन भगवान के भी चित्त मे काम अर्थात स्नेह संचारिणी कमल कुंज निवासिनी लक्ष्मी की कटाक्ष माला मेरा मंगल करे।
जिस प्रकार मेघों की घनघोर घटा में बिजली चमकती है उसी प्रकार कैटभ दैत्य के शत्रु भी विष्णु भगवान के काली मेघपंक्ति के समान मनोहर वक्ष:स्थल पर आप विद्युत के समान देदीप्यमान होती हैं तथा जो समस्त लोकों की माता, भार्गव-पुत्री भगवती श्री लक्ष्मी की पूजनीयामूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करे।
समुद्रकन्या लक्ष्मी का वह मंदालस, मंथर, अर्धोंन्मीलित चंचल दृष्टि के प्रभाव से कामदेव ने मंगलमूर्ति भगवान मधुसूदन के हृदय में प्राथमिक (मुख्य) स्थान प्राप्त किया था। वही दृष्टि यहां मेरे ऊपर पड़े।
भगवान नारायण की प्रेमिका लक्ष्मी का नेत्ररूपी मेघ, दाय रूपी अनुकूल वायु से प्रेरित होकर दुष्कर्म रूपी धाम को दीर्घकाल के लिए परे हटाकर विषादग्रस्त मुझ दीन-दुखी सदृश्य जातक पर धनरुपी जलधारा की वर्षा करे।
विलक्षण मतिमान मनुष्य जिनके प्रीतिपात्र होकर उनकी कृपा दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं, उन्हीं कमलासना कमला लक्ष्मी की वह विकसित कमल गर्भ के सदृश्य कान्तिमती दृष्टि मुझे मनोSभिलाषित पुष्टि-सन्तत्यादि वृद्धि प्रदान करें।
जो भगवती लक्ष्मी वृष्टि-क्रीड़ा के अवसर पर वाग्देवता अर्थात ब्रह्म शक्ति के स्वरूप में विराजमान होती है और पालन-क्रीड़ा के समय पर भगवान गुरुड़ ध्वज अथवा विष्णु भगवान सुंदरी पत्नी लक्ष्मी (वैष्णवी शक्ति) के स्वरूप में स्थित होती है तथा प्रयल लीला के समय शाकंभरी (भगवती दुर्गा) अथवा भगवान शंकर की प्रिय पत्नी पार्वती (रुद्रशक्ति) के रूप में विद्यमान होती है उन त्रिलोक के एकमात्र गुरु भगवान विष्णु की नित्ययौवन प्रेमिका भगवती लक्ष्मी को मेरा नमस्कार है।
हे लक्ष्मी! शुभकर्म फलदायक! श्रुति स्वरूप में आपको प्रणाम है। रमणीय गुणों के समुद्र स्वरूपा रति के रूपा में स्थित आपको नमस्कार है। शतपत्र कमल-कुंज में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा रमा को नमस्कार है तथा पुरुषोत्तम श्री हरि की अत्यंत प्राणप्रिय पुष्टि-रूपा लक्ष्मी को नमस्कार है।
कमल के समान मुखवाली लक्ष्मी को नमस्कार है। क्षीर समुद्र में उत्पन्न होने वाली रमा को प्रणाम है। चंद्रमा और अमृत की सहोदर बहन को नमस्कार है। भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी को नमस्कार है।
हे कमलाक्षि! आपके चरणों में की हुई स्तुति ऐश्वर्यदायिनी और समस्त इंद्रियों को आनन्दकारिणी है तथा साम्राज्य अर्थात पूर्णाधिकार देने में सर्वथा समर्थ एवं संपूर्ण पापों को नष्ट करने में उद्यत है। माता, मुझे आपके चरण कमलों की वन्दना करने का सदा शुभ अवसर प्राप्त होते रहे।
जिनके कृपा-कटाक्ष (तिरक्षी चितवन) के लिए की गई उपासना (आराधना), सेवक (उपासक) के लिए समस्त मनोरथ और संपत्ति का विस्तार करती है, उस भगवान मुरारी की हृदयेश्वरी लक्ष्मी का मैं मन, वचन और काया से भजन करता हूं।
हे भगवती भगवान हरि को प्रिय पत्नी! आप कमल कुंज में निवास करने वाली हैं, आपके चरण कमलों में नीला कमल शोभायमान है। आप श्वेत वस्त्र तथा गन्ध माला आदि से सुशोभित हैं। आपकी सुंदरता अद्धितीय है। हे त्रिभुवन की वैभव प्रदायिनी! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होइए।
दिग्गजों के द्वारा कनक कुंभ (सुवर्ण कलश) के मुख से पतित आकाशगंगा के स्वच्छ, मनोहर जल से जिस (भगवान) के श्री अंग का अभिषेक (स्नान) होता है उस समस्त लोकों के अधीश्वर भगवान विष्णु पत्नी, क्षीर सागर की पुत्री, जगन्माता लक्ष्मी को मैं प्रात:काल नमस्कार करता हूं।
हे कमलनयन भगवान विष्णु प्रिय लक्ष्मी! मैं दीन-हीन मनुष्यों में अग्रमण्य हूं इसलिए आपकी कृपा का स्वभाव सिद्ध पात्र हूं। आप उमड़ती हुई करुणा के बाढ़ की तरल तरंगों के सदृश्य कटाक्षों द्वारा मेरी दिशा में अवलोकन कीजिए।
जो मनुष्य इन स्तोत्रों के द्वारा नित्य प्रति वेदत्रयी स्वरूपा तीनों लोकों की माता भगवती रमा (लक्ष्मी) का स्तोत्र पाठ करते हैं वे भक्तगण इस पृथ्वी पर महागुणी और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं एवं विद्वद्जन भी उनके मनोगत भाव को समझने के लिए विशेष इच्छुक रहते हैं।
श्री भगवान शंकराचार्यजी द्वारा विरचित इस सुवर्ण, कनकधारा स्तोत्र का पाठ जो मनुष्य तीनों काल अर्थात प्रात: मध्याह्र एवं सायं में करते हैं वे लोग कुबेर के समान धनी होते हैं।
अपीलः
यदि आपको लगता है हमारी बात- ईश्वर से डरें नहीं उनसे प्रेम करें सही है और आप भी इसी में विश्वास रखते हैं तो आप प्रभु शरणम् से जुड़ जाएं. हम इसी प्रकार से ईश्वर की भक्तिरस का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं. वर्तमान समय की यही आवश्यकता है. आप प्रभु शरणम् ऐप्प डाउनलोड कर लें और हमारा फेसबुक पेज भी जरूर लाइक करें.
आप इसे ऐसे समझें कि जो ईश्वर की स्तुति का अभियान चला रहे हैं उसमें आपकी ओर से ये श्रद्धा पुष्प होंगे. आप दिनभर इंटरनेट यूज करते हैं. कुछ डेटा धार्मिक ज्ञान के लिए खर्च की जाए तो क्या हर्ज है. डाउनलोड करने के लिए प्लेस्टोर में सर्च करें- PRABHU SHARNAM और डाउनलोड कर लें.
ऐप्प का लिंक और फेसबुक पेज का लिंक दोनों ही पोस्ट की शुरूआत में भी था, फिर से दे रहे हैं. अक्षय तृतीया ऐसे शुभ कार्यों के लिए एक शुभ दिवस है.
फेसबुक पेज लाइक करें-
[sc:fb]
ये भी पढ़ें-
अक्षय तृतीयाः सोना खरीदने नहीं, सोना बनने का पर्व
बच्चों के सामने ईश्वर को कोसकर अपने बच्चे का कितना नुकसान किया कोई अंदाजा है!
पराया धन ढेला समानः सुंदर गुणों के विकास के लिए उपमन्यु की कथा बच्चों को सुनाएं
Jaye.laxmi mata ji ko jaye