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हमेशा भगवत प्रेम में डूबे रहते और प्रभु की प्रशंसा में गीत रचते और गाते रहते थे. भगवान विष्णु की मूर्ति देखते ही हरिमित्र बावले हो जाते. झूम-झूम कर गाते जाते. उनके गीत दूर-दूर तक सुनाई पड़ने लगे.
इसकी शिकायत राजा से किसी ने कर दी. अपने बनाए नियम को टूटता देख वह बौखला गया. उसने हरिमित्र को खूब पिटवाया. उनका सारा धन छीनकर घर को नष्ट करके राज्य से निकाल दिया.
कुछ बरसों बाद धर्मात्मा राजा भुवनेश मरकर स्वर्ग पहुंच गया. स्वर्ग में भुवनेश को सम्मान तो मिला पर कुछ ही देर बाद उनकी अंतड़ियां जलने लगीं. राजा यमराज के पास पहुंचे और पूछा- स्वर्ग में तो भूख प्यास लगती नहीं फिर मेरी अंतड़ियां कैसे जल रही हैं?
धर्मराज बोले- तुमसे एक घोर पाप हुआ है, तुमने एक भगवत प्रेमी की संगीत साधना भ्रष्ट की थी. संगीत से चिढ के कारण तुम्हारे यज्ञ के पुण्य का बड़ा भाग तो पहले ही नष्ट हो गए थे. अब संचित पुण्य नहीं हैं जिससे तुम स्वर्ग में रह सको.
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