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स्वामी रामानंदजी उच्च कोटि के संत थे. वह कबीरदासजी की इस भक्तिभावना से गदगद हो गए.

उन्होंने उस सभा में घोषणा की- हो सकता है कि यह यवन हो या कुछ भी हो इससे क्या अंतर पड़ता है. इसमें जो भक्ति है वह बड़े-बड़े कर्मकांडियों में नहीं. यही मेरा पहले नंबर का सबसे प्रिय शिष्य है.

ब्रह्मनिष्ठ सत्पुरुषों की विद्या हो या दीक्षा, प्रसाद खाकर मिले तो भी बेड़ा पार करती है और मार खाकर मिले तो भी बेड़ा पार कर देती है. इस प्रकार कबीरदासजी ने कीर्तन से अपनी सुषुप्त शक्तियां जगायीं और शीघ्र आत्मकल्याण कर लिया.

दुनिया का धन, यश आदि सब कुछ कमा लिया, प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंच गए, सारे वेद-वेदांगों के रहस्य भी जान लिए जायें, उन सब श्रेष्ठ उपलब्धियों से भी गुरु शरणागति और गुरुचरणों की भक्ति अधिक मूल्यवान है. योग्य गुरू स्वयं ईश्वर भेजते हैं.

कबीरदासजी को गुरू भी ऐसे संत मिले जिन्होंने शिष्य की भक्ति परखी और स्थापित परंपराओं को चुनौती दे दी. किसी से गुरूदीक्षा ले लेना या नामदान कर लेना बड़ी बात नहीं, योग्य गुरू का मिलना बड़ी बात है. तभी कबीर जुलाहा, संत कबीर बन सकते हैं. कबीरदास ने अपने गुरू के लिए लिखा है-

यह तन विष की बेल री, गुरु अमृत की खान
शीश दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान ।

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