शिवपुराण की कथा ब्रह्माजी अपने पुत्र नारद को सुना रहे हैं. पिछली कथा से आगे,

एक बार नंदी पर सवार होकर शिवजी, सतीजी के साथ पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे. भ्रमण करते-करते महादेव दंडकारण्य पहुंचे. उसी समय श्रीरामजी दंडकारण्य की वृक्ष लताओं से सीताजी पता पूछते भटक रहे थे.

रावण द्वारा सीताजी का हरण कर लेने के बाद श्रीराम वन में हा सीते, हा प्रिये, हा जानकी कहते विलाप कर रहे थे. प्रभु बड़े कष्ट में थे. शिवजी ने प्रभु को इस दशा में देखा तो अत्यंत दुखी हुए.

वह श्रीराम से कुछ वार्तालाप तो करना चाहते थे परंतु यह अवसर उचित नहीं जान पड़ा. शिवजी ने बस जय सच्चिदानंद कहकर निनम्रतापूर्वक प्रणाम किया और चुपचाप दूसरी ओर चले गए. सतीजी ने यह सब देखा. वह मोहग्रस्त हो गईं और संयम न रह सकीं.

सती शिवजी से बोल पड़ीं- ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, वरूण तथा कुबेर, सभी देव-दानव, यक्ष, गंधर्व आपको परब्रह्म परमेश्वर जानकर प्रणाम करते हैं. पर आप एक विक्षिप्त से घूम रहे मनाव को सच्चिंदानंद कहकर प्रणाम कर रहे हैं, क्यों? मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा.

शिवजी ने ताड़ लिया. उन्होंने सती को बताया कि वह स्वयं मेरे आराध्य भगवान विष्णु हैं. इन्होंने पृथ्वी का भार करने के लिए श्रीराम के रूप में अवतार लिया है. यह बताकर शिवजी मौन हो गए.

फिर भी सती को संतुष्टि न हुई. उन्हें लगा शिवजी कौतूहल कर रहे हैं. भला प्रभु को पत्नी वियोग में वन-वन भटकने की नौबत क्यों आने लगी! वह अपने स्वामी की सत्यता को परखने का विचार करने लगीं.

शिवजी ने कहा- यदि मुझ पर संदेह है तो स्वयं परख लीजिए. सती ने सीताजी का रूप धरा और श्रीराम-लक्ष्मण के सामने आ खड़ी हुईं. लक्ष्मण विस्मय में थे लेकिन प्रभु ने सारा भेद जान लिया.

प्रभु ने देवी को प्रणाम कर पूछा- आज आप अकेली कैसे घूम रही हैं, महादेव कहां हैं? अपना वास्तिवक रूप छोड़कर यह रूप क्यों धारण किया है? सतीजी को तत्काल अपनी भूल का अहसास हुआ.

उन्हें पछतावा हो रहा था कि क्यों प्रभु की परीक्षा ऐसे समय में ली जब वह कष्ट में डूबे हैं. वह श्रीराम से बोलीं- भगवन आप स्वयं श्रीहरि हैं इसका कोई लक्षण तो स्पष्ट नहीं था पर शिवजी ने आपको पहचान लिया था. वह आपके दर्शन को व्याकुल हुए थे.

मेरे पूछने पर शिवजी ने मुझे आपके बारे में बताया तो था किंतु मुझे विश्वास न हुआ. अब मैं जान चुकी हूं. शिवजी आपको प्रणाम करते हैं- इससे कई बातें मन में आती हैं. शंका का समाधान करें.

श्रीराम बोले- एक बार शिवजी ने विश्वकर्मा को बुलाया और गोशाला में भव्य भवन निर्माण कराया. उस भवन में एक दिव्य सिंहासन भी बनाया गया. शिवजी ने सभी देवों-असुरों, यक्षों-गंधर्वों, सिद्धों और ऋषि-मुनियों को बुलवाया.

फिर सबकी उपस्थिति में मुझे उस सिंहासन पर पूरे गौरव के साथ बिठाकर घोषणा की- सभी को ज्ञात हो कि आज मैंने विष्णुजी को लोकेश बना दिया है. आज से यह आप सबके साथ-साथ मेरे लिए भी प्रणम्य हो गए हैं.

फिर शिवजी ने मेरा अभिषेक करके सम्मान के साथ प्रणाम किया. उन्होंने मुझे वरदान दिया- आज से आप सृष्टि के कर्ता, भर्ता और हर्ता का दायित्व निभाएं. भक्तों को काम-मोक्ष प्रदान करने वाले और दुष्टों का दमन करने वाले बनें. आपको तीन शक्तियां प्रदान करता हूं.

इच्छा की सिद्धि, लीला और प्रकट होने का सामर्थ्य तथा निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता. आप त्रिलोक में अजेय बन जाएंगे. आप मुझसे भी पराजित नहीं होंगे. विश्व को मोहित करने की शक्ति प्रदान करता हूं. आप विविध अवतार लेकर अधर्म का नाश और धर्म की रक्षा करें.

इस प्रकार शिवजी ने मुझे अपनी अखंड शक्तियां प्रदान कर दीं और कैलास पर अपने गणों के साथ स्वच्छंद विहार करने लगे. चूंकि उन्होंने सारी शक्तियां गोशाला में प्रदान की थीं इसलिए मैं वहां गोपवेश में रहने लगा.

अभी मैंने रावण का वध करने के लिए रामावतार लिया है. उसने मोहित होकर सीता का हरण किया है. शिवजी ने ही विधान किया है कि जो भी पृथ्वीलोक पर आएगा उसे लोक व्यवहार का पालन करना होगा. अतः मैं मनुष्य की तरह पत्नी वियोग में शोकाकुल हूं.

श्रीराम और सती के बीच के इस संवाद का प्रसंग नारद को सुनाकर ब्रह्माजी बोले- हे नारद! सती यह सब जानकर संतुष्ट हो गईं. श्रीराम ने उन्हें प्रणाम किया और फिर उनसे अनुमति लेकर अपनी भूमिका का निर्वाह करने लगे.

परंतु इससे सती के सामने एक बड़ा संकट आ खड़ा हुआ. (शिव पुराण रूद्र संहिता, सती खंड-2) क्रमशः जारी….

संकलन व संपादनः राजन प्रकाश

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