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माण्डव्य के मन में यह समझने की लालसा हुई कि आखिर किस कारण से उन्हें ऐसा कष्ट मिल रहा है. वह धर्मराज के पास पहुंचे और पूछा- मेरे किस पाप का फल मुझे इस रूप में भुगतना पड़ा है.
धर्मराज ने बताया— आपने बचपन में एक पतंगे के पुच्छ भाग में सींक घुसेड़ दिया था और वह पीड़ा से छटपटाता रहा. माण्डव्य ने कहा- बचपन में शास्त्रज्ञान नहीं होता और बाल्यकाल के अपराधों का इतना बड़ा दंड.
हे घर्मराज! अज्ञानता में हुए बाल्यकाल के अपराध तो क्षम्य हैं. फिर भी आपने मुझे ऐसा कड़ा दंड दिया. मैं आपको शाप देता हूं कि आपको राजा, दासी पुत्र व चाण्डाल रूप में जन्म लेकर संसार के कष्ट भोगने होंगे.
धर्मराज ने उनसे अपनी भूल का पश्चाताप किया तो माण्डव्य ने कहा- आप पृथ्वीलोक पर जन्म तो लेंगे किंतु अपने गुणों के कारण आप सबके लिए श्रद्धेय और अनुकरणीय बनंगे. आपका बड़ा सम्मान होगा.
वैशम्पायनजी ने जनमेजय से कहा- हे राजन! इसी शाप के कारण धर्मराज को राजा युधिष्ठिर, दासीपुत्र विदुर एवं चाण्डाल के घर में वाल्मीकि के रूप में जन्म लेना पड़ा. (महाभारत की कथा)
संकलन व संपादनः राजन प्रकाश
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