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करोड़ों सूर्यों के प्रकाश और चंद्रमाओं की शीतलता का अनुभव कराने वाले तीन नेत्रों वाले दिव्य शरीर के साथ वे प्रकट हुई उन्होंने पैरों की लंबाई तक का जो हार पहन रखा था वह चमकने वाले मोतियों से बना था.

मुसकराते हुये मां जगदंबा ने हाथ जोड़ कर खड़ी हुई शची से कहा. तुम्हारी आराधना से प्रसन्न हूं, मैं सुगमता से प्रकट नहीं होती करोड़ों जीवन का पुण्य इकट्ठा होने पर ही प्राणी मेरे दर्शन पा सकते हैं. अब मांगो जो कुछ मन में हो. शची बोली, माते पति का दर्शन हो जाये और नहुष से कोई भय न रहे. बस इतना ही.

देवी जगदंबा ने कहा, मेरी इस दूती के साथ जाओ. मानसरोवर के पास मेरी एक मूर्ति को जिसे विश्वकामा कहते हैं. वहीं इंद्र से तुम्हारी भेंट हो जायेगी. जल्द ही मैं नहुष को मोहित करुंगी और इसके कारण उसकी ताकत नष्ट हो जायेगी. इंद्र का पद उसके हाथ से जाता रहेगा. तुम्हारा मनोरथ मैं पूरा कर दूंगी.

देवी की दूती को साथ ले कर शची मानसरोवर पर विश्वकामा प्रतिमा के पास पहुंची. इंद्र उस समय वहीं छिपे थे. शची को मिल गये. इंद्र शची को वहां देखकर हैरान होकर पूछा मेरा यहां का पता किसने दिया तो शची ने कहा, मां जगदंबा ने.

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