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हम कपड़े लेने जाते हैं. दुकानदार कहता है जो भी पसंद आए किनारे करते रहिए. सैकड़ों में से पहले 10 से 15 किनारे कर लेते हैं. फिर उसमें से छटांई करते हैं तो तीन से चार पर पहुंचते और यहां आकर होती है सबसे बड़ी दुविधा.
काश चारों ले लेते. पर लेना एक है. अब दुकानदार से लेकर परिचितों से राय पूछते हैं. कोई अपरिचित भी दुकान में आ गया हो और उससे नजर मिल जाती है तो उसकी राय भी पूछ ही लेते हैं. होता है न ये सब.
बडी मुश्किल से मन मसोसकर एक को लेकर चलते हैं और रास्ते भर उनके बारे में सोचते रहते हैं जिन्हें छोड़कर आए. जो प्राप्त हुआ वह पर्याप्त हुआ ही नहीं. एक नई ख्वाहिशों की लिस्ट अपनी जगह खड़ी है और फिर उसे पूरा करने की मारामारी.
तो उपाय क्या है? जैसे सैकड़ों में से छांटकर दस अलग किया उसी तरह इच्छाओं को प्रयत्नपूर्वक कम करते जाइए. याद रखिए बहुत धन नहीं है तो चोरी का भय नहीं है, नींद अच्छी आ जाएगी. धन जैसे-जैसे बढ़ेगा वैसे-वैसे शंका की प्रवृति डालेगा.
चोरी का भय भरेगा. सामर्थ्य का अभिमान भर देगा. द्वेष का शत्रु साथ लेकर आएगा और उसे लगातार बढ़ाते रहने की प्रवृति के रूप में लालच की सुरसा साथ में आएगी जो इतना मुंह फैला सकती है कि हनुमानजी भी चकमा न दे पाएं.
कहीं तो रूकेंगे हम. कभी तो कहेंगे- हे प्रभु अब मैं संतुष्ट हूं. असंतोष के भाव में भरकर जाएंगे आप ईश्वर के पास. स्वाभिमानी को ही सम्मान मिलता है, चाहे धरती हो या देवलोक.
जितनी देर आप इसे पढ़ेंगे उतनी देर तो सहमत हो ही जाएंगे लेकिन कथा से एग्जिट करते ही फिर शुरू हो जाएगा वही दो दूनी पांच. पांच चवन्नी बराबर एक रूपैया बनाने का भाव.
यदि दो मिनट के लिए ही सही सोचने को विवश हुए इस बात से तो इसमें भी अपनी सफलता समझता हूं, बार-बार आपको झकझोरता रहूंगा. क्या पता किसी एक दिन यह सच में आपको जगा दे. मैं तो प्रयास करता रहूंगा. प्रभु शरणम् बनाया ही इसलिए है.
– राजन प्रकाश
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yar bhagwan har cheej deta hi aduri hai to list kabhi khtama hi nhi hoti
अति उत्तम कथा भाई आप से क़रज़ोर विनम्र निवेदन हैं की ऐसी कथाएँ हमारे मेल पे भेजने का कस्त करे