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बिना आवश्यकता लिया किसी से लिया हुआ एक कंकड-पत्थर भी बहुत भारी चट्टान के बोझ जैसा हो जाता है. परमार्थ के लिए लिया गया विपुल धन भी फूलों के हार जैसा है जिसे धारण करना चाहिए.
मुझे यदि किसी धार्मिक प्रयोजन के लिए धन की आवश्यकता होगी तो मैं स्वयं याचक की तरह आपके पास आउंगा.
उस समय मैं आवश्यकता अनुसार दान स्वीकार करूंगा परंतु आज तो यह मेरे लिए बोझ जैसा ही है.
राजा इन बातों को सुनकर काफी प्रभावित हुआ. राजा जब जाने को हुआ तो महात्माजी उसे दरवाजे तक छोड़ने आए.
राजा ने पूछा- महात्मन मैं जब आया था तब आपने मेरी ओर देखा तक नहीं था, अब बाहर तक छोड़ने आ रहे हैं. ऐसा परिवर्तन क्यों?
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