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इस प्रकार भोगे भी धनी हो गया, मगर धन पाकर वह घमंडी नहीं हुआ. दूसरे साल का पितृपक्ष आया. श्राद्ध के दिन भोगे की स्त्री ने छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाएं. ब्राह्मणों को बुलाकर श्राद्ध किया. भोजन कराया, दक्षिणा दी.
जेठ-जेठानी को सोने-चांदी के बर्तनों में भोजन कराया. इससे पितर बड़े प्रसन्न तथा तृप्त हुए. रात को जेठानी भोगे द्वारा किए श्राद्ध की प्रशंसा करने लगी तो जोगे ने कहा- उसने सिर्फ श्राद्ध नहीं किया तुम्हारे मुंह पर थूका भी है.
जोगे की पत्नी को अपनी भूल का आभास हुआ. उसने निश्चय किया कि श्राद्ध के नाम पर मायके के सामने अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करने के स्थान पर विधिवत श्राद्ध करेगी. अगले साल पितर आए और दोनों बेटों द्वारा किए श्राद्ध से प्रसन्न होकर उन्हें सुख-संपत्ति और आज्ञाकारी संतान का आशीर्वाद दिया.
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