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मैंने आपकी भूख मिटाने का वचन दे दिया है इसलिए वचनबद्ध हूं परंतु अभी मेरे पास रथ के अलावा वेगवहन करने वाला कोई धनुष, अक्षय बाणों से युक्त तरकश भी नहीं है. मुझे तो पहले इन आयुधों को प्राप्त करना होगा तब तक आप प्रतीक्षा करें.
अग्निदेव तो इतने बेचैन थे कि वह प्रतीक्षा कर ही नहीं सकते थे.
उन्होंने वरुण देव का आवाहन करके गांडीव धनुष, अक्षय तरकश, दिव्य घोड़ों से जुता हुआ एक रथ मांगा जिसे अर्जुन को समर्पित किया. अग्नि ने श्रीकृष्ण को एक चक्र भी समर्पित किया.
गांडीव धनुष अलौकिक था. वह किसी शस्त्र से नष्ट नही हो सकता था तथा अन्य लाख धनुषों की बराबरी कर सकता था. उसके साथ ही अग्निदेव ने एक अक्षय तरकश भी अर्जुन को प्रदान किया था जिसके बाण कभी समाप्त नहीं होते थे.
गति को तीव्रता प्रदान करने के लिए जो रथ अर्जुन को मिला उसमें आलौकिक घोड़े जुते हुए थे तथा उसके शिखर पर एक दिव्य वानर बैठा था. उस ध्वज में अन्य जानवर भी विद्यमान रहते थे जिनके गर्जन से दिल दहल जाता था.
अग्नि ने कृष्ण को एक दिव्य चक्र प्रदान किया, जिसका मध्य भाग वज्र के समान था. वह मानवीय तथा अमानवीय प्राणियों को नष्ट कर पुनः श्रीकृष्ण के पास लौट आता था.
अग्निदेव ने खांडव वन को सब ओर से प्रज्वलित कर दिया. जो भी प्राणी बाहर भागने की चेष्टा करता, अर्जुन तथा श्रीकृष्ण उसका पीछा करते. खांडव वन के प्राणी व्याकुल हो उठे. उनकी सहायता के लिए इन्द्र आए पर अर्जुन तथा कृष्ण के सम्मुख एक न चली.
तभी इन्द्र के लिए एक आकाशवाणी हुई- तुम्हारा मित्र तक्षक नाग कुरुक्षेत्र गया हुआ है, अतः खांडव वनदाह से बच गया है. अर्जुन तथा श्रीकृष्ण के कार्य में बाधा न डालो. यह सुनकर इन्द्र भी अपने लोक चले गए.
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