April 29, 2026

कुंभ कथाः माता की मुक्ति के लिए गरूड़ अमृत याचना के लिए निकले गरुड़ ने खाया हाथी और कछुआ. भाग-3

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पिछली कथा में आपने पढा कि गरुड़ ने अपनी मां को सर्पों की माता के दासीत्व से मुक्ति दिलाने की ठान ली. सर्पों ने अमृत के बदले उनकी माता को मुक्त करने की शर्त रखी. गरुड़ अपनी माता से अमृत लाने के लिए जाने की अनुमति लेने पहुंचे.

गरूड़ ने माता से पूछा कि भूख लगने पर मार्ग में उन्हें क्या खाना चाहिए? विनता ने बताया- समुद्र में निषादों की एक बस्ती है. उन्हें खाकर तुम अमृत ले आओ लेकिन याद रखना, ब्राह्मण का वध कभी न करना.

गरुड़ माता से अनुमति लेकर उड़े. उन्हें समुद्र का वह द्वीप दिखा. वहां पर उन्हें निषाद मिले. माता की आज्ञा के अनुसार द्वीप के निषादों को खाकर वे आगे बढे. किंतु भूल से निषादों के साथ-साथ एक तपस्वी भी उनके मुंह में आ गया.

तपस्वी ब्राह्मण के तेज से उनका तालू जलने लगा. गरूड़ को अपने प्राण संकट में दिखने लगे. कोई राह नहीं सूझी तो घबराकर वह अपने पिता कश्यप ऋषि के पास पहुंचे और अपनी पीड़ा बताई.

कश्यप ने उस जलन से उन्हें मुक्ति दिलायी और कुशलक्षेण पूछा. कश्यप ने पूछा कि क्या उसे आवश्यकता असार भोजन नहीं मिल पा रहा जो वह अखाद्य वस्तुएं खाने को विवश हुए.

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गरुड़ ने बताया कि वह माता को दासीत्व से मुक्ति दिलाने के लिए सर्पों के कहने पर अमृत लाने के लिए चले थे. माता ने ही निषादों का भोजन करने को कहा था परंतु उससे मेरा पेट नहीं भरा.
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