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अर्जुन ने पाशुपत अस्त्र निकालकर भगवान शंकर को स्मरण किया. महादेव ने दोनों शस्त्रों को मनाया. फिर भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे.

महादेव ने कहा- प्रभो! भक्तों की बात के आगे अपनी प्रतिज्ञा भूल जाना तो आपका सहज स्वभाव है. आपने भक्तों का मान रखने के लिए अनगिनत बार ऐसा किया है. अब इस लीला को यहीं समाप्त कीजिए.

प्रभु ने अर्जुन को गले लगाकर चित्रसेन को अभय किया. सब लोग धन्य-धन्य कह उठे, पर गालव को यह बात अच्छी नहीं लगी.

उन्होंने कहा, “यह तो अच्छा मजाक रहा.”  ऋषि ने कहा- मैं अपनी शक्ति से सुभद्रा समेत चित्रसेन को जला डालता हूं. ऐसा कहकर उन्होंने जल हाथ में लिया.

तभी सुभद्रा बोल उठी- मैं यदि कृष्ण की भक्त हूं और अर्जुन के प्रति मेरा पतिव्रत्य पूर्ण हो तो यह जल ऋषि के हाथ से पृथ्वी पर न गिरे.

ऐसा ही हुआ. गालव का भी अपनी शक्ति से घमंड टूटा. उन्होंने प्रभु को नमस्कार किया और आश्रम लौट गए.
(प्रचलित किंवदंति)

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