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अपने सभी अस्त्र-शस्त्र गंवा चुके,निराश तथा दुःखी पांडवों ने श्रीकृष्ण के साथ एकाग्र मन से शंकरजी की स्तुति आरंभ कर दी. भगवान शिवजी का क्रोध शांत हो चुका था. प्रसन्न हो भगवान शंकर प्रकट हुए और उनसे वर मांगने को कहा.

पांडवों की ओर से भगवान् श्रीकृष्ण बोले– हे भगवन, पांडवों के जो शस्त्रास्त्र आपके शरीर में विलीन हो गए हैं, उन्हें वापस कर दीजिए. इन्हें आपने जो श्राप दे दिया है उससे भी मुक्त कर दीजिए.

आदिदेव भगवान शिवजी ने कहा– हे श्रीकृष्ण! उस समय मैं आपकी माया से मोहित था. उसी माया में पड़कर ही मैंने यह शाप दे दिया. मेरा वचन तो नहीं बदल सकता, पर मुक्ति का मार्ग बताता हूं.

पांडव तथा कौरव अपने अपने अंशों से कलियुग में जन्म लेकर अपने पापों का फल भोगकर अपने पापों और मेरे शापों से मुक्त हो जायेंगें. युधिष्ठिर वत्सराज का पुत्र बनकर पैदा होगा.

उसका नाम बलखानि (मलखान) रखा जाएगा. वह शिरीष नगर का राजा होगा. भीम वीरण के नाम से बनारस पर राज करेगा. अर्जुन के अंश से जो जन्म लेगा, उसका नाम होगा ब्रह्मानंद होगा. वह महान बुद्धिमान और मेरा भक्त होगा.

महाबलशाली नकुल का जन्म कान्यकुब्ज में रत्नभानु के पुत्र के रूप में होगा और नाम होगा लक्षण. सहदेव भीमसिंह का पुत्र देवसिंह होगा. धृतराष्ट्र के अंश से अजमेर में पृथ्वीराज जन्म लेगा.

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1 COMMENT

  1. यह कथा गढ़ी हुई है और गलत है। भविष्य पुराण को काफी हद तक बदला गया है। महाभारत युद्ध आरम्भ होने के बाद कहीं भी भगवान् शिव की पूजा का उल्लेख वेदकव्यास द्वारा कही गयी और भगवान् गणेश द्वारा लिखी “जय संहिता” यानि महाभारत के किसी खण्ड में नहीं है। इस कथा को पृथ्वीराज चौहान व् उनके कुल में उत्पन्न राजपूतों के वध हेतु झूठा बनाकर लिखा गया था, क्यूंकि आल्हा और उद्दल के महोबा राज्य की चौहान कुल से शत्रुता थी।
    सत्य यह है कि राजस्थान के लोक गीतों व् स्थानीय इतिहास में आल्हा को भीम का व् उद्दल को युद्धिष्ठिर का अवतार माना जाता है, परन्तु इसका कोई शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इस मान्यता का आधार यह भी है कि दोनों आल्हा व् उद्दल दैवीय शक्तियों से युक्त थे और स्वयं अश्वत्थामा ने पृथ्वीराज को दो शबदभेदि दिव्य बाण आल्हा और उद्दल मारने के लिए दिए थे, जिनमें से एक बाण सेचौहान ने आल्हा को मारा था व् दूसरे बाण से अपने सौतले मामा शाहबुद्दीन घुरी को।

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