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जैसा आहार लेंगे, वैसा व्यवहार हो जाएगा. जो सात्विक भोजन करते हैं उनके विचार सात्विक रहते हैं. बात-बात पर क्रोध नहीं आता, किसी का बुरा करने को नहीं सोचते.
जिनका आहार दूषित होता है उनकी बुद्धि नीति-अनीति का अंतर कुशलता से नहीं कर पाती. इसे ऐसे समझें कि मांस-मदिरा के सेवन के पश्चात स्वभाव में उग्रता आती है किंतु जैसे ही वह आहार शरीर से बाहर जाता है व्यवहार पर पछतावा होने लगता है.
जैसा अन्न वैसा मन!!
संकलनः चंद्र किरण
संपादनः राजन प्रकाश
(यह कथा उज्जैन से चंद्र किरण जी ने भेजी. चंद्र किरण जी धार्मिक-आध्यात्मिक कार्यो में रूचि रखती हैं. इनकी भेजी कथाएं पहले भी प्रभु शरणम् में प्रकाशित हुई हैं)
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