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उस जटाजूट वेष में भी शिवजी बड़े आकर्षक लग रहे थे लेकिन इंद्र उन्हें पहचान नहीं पाए. उन्होंने उनका नाम और परिचय पूछा. जटाधारी दिगंबर ने कहा- मैं शिव का अनुचर हूं. आप अभी अंदर नहीं जा सकते क्योंकि शिवजी अपने स्थान पर नहीं हैं.
इंद्र ने पूछा- कहां गए हैं शिवजी. कई तरह के सवाल करने के बाद उन्होंने दिगंबर से रास्ते से किनारे हटने को कहा लेकिन दिगंबर ने उसे अनसुना कर दिया. वह कुछ सुनता ही न था जैसे. इंद्र बार-बार पूछते रहे पर वह चुप ही रहा.
इंद्र तो देवराज होने और स्वर्ग के ऐश्वर्य के स्वामी होने के अभिमान में चूर थे. उन्हें क्रोध आ गया और उन्होंने व्रज चला दिया. शिवजी ने व्रज समेत इंद्र का हाथ स्तंभित कर दिया. शिवजी क्रोध से तमतमाने लगे.
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