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वह शक्ति गरूड को लगी किंतु गरूड बस थोड़े से विचलित हुए. भगवान ने उस पर प्रहार कर उसके सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त कर दिए. फिर ब्रह्माजी का मान रखने के लिए उन्होंने सत्यभामा के हाथों भौमासुर का वध करा दिया.

इसके बाद पृथ्वी वहां उपस्थित हो गईं. उन्होंने भगवान से अनुरोध किया कि वह भौमासुर के पुत्र को अभयदान दें ताकि उसका वंश न समाप्त होने पाए. भगवान ने अनुरोध मान लिया.

भगवान ने अदिति के कुंडल वरूण का छत्र प्राप्त किया और भौमसुर द्वारा हरण की गई देवपुत्रियों तथा मुनिपुत्रियों को नरकासुर की कैद से मुक्ति दिलाई गई. उन सबने भगवान श्रीकृष्ण से विनती की कि वह उन्हें स्वीकार करें ताकि उन्हें सम्मान प्राप्त हो.

भगवान ने सभी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर उनका खोया सम्मान उन्हें लौटाया तथा अमृतवर्षा करने वाले देवमाता अदिति के कर्णफूल भी उन्हें पुनः अर्पित कर दिए.

विजय के प्रतीक चिह्न के रूप में भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर के रक्त से अपने मस्तक पर तिलक किया था. इस कारण भगवान के शरीर में असुर के शरीर का दुर्गंध समा गई थी.
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