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बृहस्पति के वचन सुनकर महेश्वर बोले- मैं स्वयं को तो रोक लूं पर मेरे नेत्रों से निकले इस क्रोध को कैसे रोकूं? बृहस्पति ने याचना की- हे भक्तवत्सल आप तो शऱणागत की रक्षा किसी भी प्रकार से करते हैं. इंद्र आपके चरणों में पड़े हैं. इन्हें अभय दीजिए.
शिवजी बोले- तुम्हारी स्तुति से मैं प्रसन्न हूं. आज इंद्र समाप्त हो गया होता किंतु तुमने उसे जीवनदान दिलाया है इसलिए आज से तुम्हारा एक नाम जीव भी होगा. मेरे नेत्रों की अग्नि अब इंद्र को पीड़ित नहीं करेगी.
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