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लड़के को कमाना तो आता न था. जब पास में कुछ न बचा तो वह इलापुर छोड़कर चन्द्रपुरी नगरी में चला गया. वहाँ के हेमगुप्त नाम के साहूकार का नाम उसने कभी पिता से सुन रखा था. उसने उसी के पास जाने का मन बनाया.
बहुत बूढे हो चुके हेमगुप्त के पास जाकर उसने अपने पिता का परिचय दिया और कहा कि मैं व्यापार को गया था. धन कमाया; लेकिन लौटते में समुद्र में भयंकर तूफ़ान आया. माल सहित जहाज़ डूब गया और मैं जैसे-तैसे बचकर यहाँ आ गया.
हेमगुप्त के एक लड़की थी रत्नावती. सेठ को बड़ी खुशी हुई कि घर बैठे इतना अच्छा लड़का मिल गया. उसने महाधन के बेटे से कहा कि वह निश्चिंत हो कर जब तक चाहे उसी के वहां रहे.
उस लड़के को अपने हेमगुप्त ने घर में रख लिया. महाधन के बेटे ने भी अपनी बुरी आदतें कुछ दिन रोके रखीं तो जल्द ही हेमगुप्त ने भी अवसर देख अपनी लड़की से उसका ब्याह कर दिया.
अब महाधन का बेटा उसका घर जमाई बन कर वहीं रहने लगा. पर ऐसा कब तक चलता. लड़्की ने भी कह कि वह ससुराल देखना चाहती है. लोग तो खैर ताने देते ही थे. महाधन आ बेटा भी मनमौजी का जीवन चाहता था. अन्त में एक दिन वे वहाँ से विदा हुए.
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