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तीज की पूजन सामग्री व पूजा की विधिः
विभिन्न फूलों की माला, काली मिट्टी अथवा बालू रेत, मंडप बनाने के लिए, केले का पत्ता, मौसमी फल एवं फूल पत्ते, बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे, आंकड़े का फूल, तुलसी, मंजरी, शिवजी को अर्पित करने वाले जनेऊ, वस्त्र.
माता गौरी को चढ़ाने के लिए सुहाग का पूरा सामान जिसमें चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, माहौर, मेहंदी, सुगंध आदि शृंगार की सभी सामग्री जो महिलाएं प्रयोग करती हैं.
गणेशजी एवं अन्य देवों को अर्पित करने के लिए घी, तेल, दीपक, कर्पूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश. पंचामृत के लिए घी, दही, शक्कर, दूध, शहद. हरतालिका पूजन प्रदोष काल अर्थात दिन और रात के मिलने के समय किया जाता है.
यदि कोई सामग्री उपलब्ध नहीं हो सकी तो चिंता न करें. जो सामग्री उपलब्ध है उसी से पूजन किया जा सकता है.
पूजन के लिए शिव, पार्वती एवं गणेशजी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से हाथों से बनाई जाती हैं.
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जैसे विवाह के लिए मंडप सजता है वैसे ही मंडप सजाएं. उसके भीतर रंगोली डालकर चौकी पर पहले केले के पत्ते को रखते हैं.
तीनों प्रतिमाओं को केले के पत्ते पर आसीन करें.
सर्वप्रथम कलश के उपर नारियल अथवा एक दीपक जलाकर रखें. घड़े के मुंह पर लाल कपड़ा बांध दें और अक्षत चढ़ाएं.
कलश का पूजन कुमकुम, हल्दी चावल और पुष्प चढ़ाकर करें.
कलश के बाद गणेशजी की पूजा की जाती हैं. गणेशजी की पूजा पूरे विधि-विधान से की जानी चाहिए. उसकी पूरी और सबसे सरल विधि प्रभु शरणम् ऐप्पस में दी गई है. लिंक इस लाइन के नीचे है. यहां से डाउनलोड कर लें.
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उसके बाद शिवजी की पूजा करें.
शिवजी की पूजा के बाद माता गौरी की पूजा की जाती है. उन्हें सम्पूर्ण शृंगार अर्पित किया जाता है. यह पूजा संपन्न करने के बाद तीज व्रत की कथा सुनी जाती है.
यह पूजा आमतौर पर महिलाएं समूह में करती हैं. फिर गणेशजी, शिवजी और पार्वतीजी की सामूहिक आरती की जाती है. माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता है, उस सिंदूर से सुहागन स्त्रियां सुबह अपनी मांग भरें.
शिव-पार्वती की प्रतिमाएं पवित्र जल में विसर्जित कर दें.
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तीज व्रत कथाः
तीज व्रत के माहात्म्य की कथा शिवजी ने पार्वतीजी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण करवाने के उद्देश्य से सुनाई थी. वह कथा इस प्रकार से है-
शिवजी बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था. इस अवधि में तुमने अन्न का त्यागकर केवल वायु का ही सेवन किया. फिर तुमने सूखे पत्ते चबाकर तप किया. माघ की ठंढ़ में तुम जल में खड़े होकर तप किया करती थीं. वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि जलाकर तप किया और शरीर को तपाया.
श्रावण की मूसलाधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न जल ग्रहण किए तप करती रहीं. तुम्हारी इस कष्टदायक तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता पर्वतराज हिमवान बहुत दुःखी और नाराज़ होते थे. तब एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराज़गी देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे.
तुम्हारे पिता ने नारदजी से आने का कारण पूछा तो नारद बोले– हे गिरिराज! मैं भगवान् विष्णु के भेजने पर यहां आया हूँ. आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना चाहते हैं. इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूं.
नारदजी की बात सुनकर पर्वतराज प्रसन्न होकर बोले- यदि स्वयं विष्णुजी मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो यह हर्ष की बात है. वह तो साक्षात ब्रह्म हैं. हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पुरुष की जीवनसंगिनी बने.
तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी बैकुंठ लोक चले गए औरर विष्णुजी को विवाह तय होने का समाचार सुनाया परंतु जब सखियों से तुम्हें इस बारे में पता चला तो तुम्हारे दुःख का ठिकाना ना रहा. तुम्हें दुःखी देखकर, तुम्हारी एक सहेली ने दुःख का कारण पूछा.
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तुमने बताया -मैंने सच्चे मन से शिवजी का वरण किया है किन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है. मैं विचित्र धर्मसंकट में हूँ. अब प्राण त्याग देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.
तुम्हारी सखी बहुत समझदार थी. उसने कहा- प्राण छोड़ने का क्या लाभ? संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिए. नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण करे, जीवनपर्यन्त उसी से निर्वाह करे. सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो भगवान् भी असहाय हैं. मैं तुम्हें घनघोर वन में ले चलती हूँ जो साधना स्थल भी है. वहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी नहीं पाएंगे. मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे.
तुमने ऐसा ही किया. तुम्हारे पिता तुम्हें न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए. वह सोचने लगे कि मैंने तो विष्णुजी से अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया है. यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गये और कन्या घर पर न मिली तो बहुत अपमान होगा.
ऐसा विचारकर पर्वतराज ने चारों ओर तुम्हारी खोज शुरू करवा दी. इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगीं. तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया.
रात भर मेरी स्तुति में गीत गाकर जागरण किया. तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुँचा और तुमसे वर मांगने को कहा.
अपनी तपस्या को सफल देखकर तुमने कहा- मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूँ. यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिये. ‘तब ‘तथास्तु’ कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया.
प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित करके अपनी सखी सहित व्रत का वरण किया. उसी समय गिरिराज अपने बंधु-बांधवों के साथ तुम्हें खोजते हुए वहाँ पहुंच गए. तुम्हारी दशा देखकर दुःखी हुए और इसका कारण पूछा.
तुमने कहा-पिताजी, मैंने अपना जीवन कठोर तप में बिताया है. इस तप का उद्देश्य शिवजी को पति के रूप में प्राप्त करना था. आज मैं सफल रही. आप मेरा विवाह विष्णुजी से करने का निश्चय कर चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की तलाश में एकांत में चली गयी. शिवजी ने मुझसे विवाह का वचन दिया है. अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घऱ चलूंगी कि आप मेरा विवाह महादेवजी के साथ ही करेंगे. पर्वतराज मान गए और तुम्हें घर वापस ले गये. कुछ समय बाद उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ हमारा विवाह किया.
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भगवान् शिव ने आगे कहा- तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह संभव हो सका. इस व्रत का महत्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मनवांछित फल देता हूं. अखंड सौभाग्य तथा पुत्र-पौत्र आदि से भरपूरे परिवार के साथ दीर्घायु होती है.
भगवान् शिव ने पार्वतीजी से कहा कि इस व्रत को जो भी स्त्री पूर्ण श्रद्धा से करेगी उसे तुम्हारी तरह अचल सुहाग प्राप्त होगा. देश के बड़े भाग में भाद्रपद की तृतीया को भी यह व्रत मनाया जाता है और यही कथा सुनी जाती है. उसे हरितालिका कहा जाता है.
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