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भावार्थ:- जिस हवा से सुमेरु जैसे विशाल पर्वत उड़ जाते हैं. उनके सामने रूई की भला क्या गिनती? श्री रामजी की असीम प्रभुता को समझकर कथा रचने में मेरा मन बहुत हिचकता है.

दोहा :
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान॥12॥

भावार्थ:- सरस्वतीजी, शेषजी, शिवजी, ब्रह्माजी, शास्त्र, वेद और पुराण- ये सब ‘नेति-नेति’ कहकर (पार नहीं पाकर ‘ऐसा नहीं’, ऐसा नहीं कहते हुए) सदा जिनका गुणगान किया करते हैं.

चौपाई :
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥
तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥1॥

भावार्थ:- यद्यपि प्रभु श्री रामचन्द्रजी की प्रभुता को सब वर्णन से ऊपर मानते ही हैं. फिर भी उसे कहे बिना कोई नहीं रहा. इसमें वेद ने ऐसा कारण बताया है कि भजन का प्रभाव बहुत तरह से कहा गया है.

अर्थात भगवान की महिमा का संपूर्ण वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता. फिर भी जिससे जितना बन पड़े उतना गुणगान करना चाहिए, क्योंकि भगवान के गुणगान रूपी भजन का प्रभाव बड़ा अनोखा है. उसके प्रभाव का शास्त्रों में वर्णन है. भगवान का थोड़ा सा भी भजन मनुष्य को सहज ही भवसागर से तार देता है.

एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा॥
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना॥2॥

भावार्थ:- जो परमेश्वर एक है, जिनके कोई इच्छा नहीं है, जिनका कोई रूप और नाम नहीं है, जो अजन्मा, सच्चिदानन्द और परमधाम है और जो सबमें व्यापक एवं विश्व रूप हैं, उन्हीं भगवान ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकार की लीला की है.

सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी॥
जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥3॥

भावार्थ:- वह लीला केवल भक्तों के हित के लिए ही है, क्योंकि भगवान परम कृपालु हैं और शरणागत के बड़े प्रेमी हैं। जिनकी भक्तों पर बड़ी ममता और कृपा है, जिन्होंने एक बार जिस पर कृपा कर दी, उस पर फिर कभी क्रोध नहीं किया.

गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥4॥

भावार्थ:- वे प्रभु श्री रघुनाथजी गई हुई वस्तु को फिर प्राप्त कराने वाले दीनों के नाथ दीनानाथ, सरल स्वभाव, सर्वशक्तिमान और सबके स्वामी हैं. यही समझकर बुद्धिमान लोग उन श्रीहरि का यशगान कर अपनी वाणी को पवित्र और उत्तम फल देने वाली बनाते हैं.

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा॥
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई॥5॥

भावार्थ:- रघुनाथ की महिमा के यथार्थ वर्णन में सक्षम नहीं हूं, परन्तु मैं तो इसे महान फल देने वाला भजन समझकर गाता हूं. भगवत्कृपा के बल पर ही मैं श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में शीश नवाकर उनके गुणों की कथा कहूंगा.

वाल्मीकि, व्यास आदि मुनियों ने भी जो पहले जो हरि की कीर्ति गाई है, वह इसी भाव से गाई थी. भाई! उसी मार्ग पर चलना मेरे लिए सुगम होगा.

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