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भीष्म ने कहा- इसी प्रश्न की प्रतीक्षा थी. जैसा अन्न वैसा मन. मैं दुर्योधन जैसे अधर्मी का अन्न खा रहा था. उस अन्न ने मेरी बुद्धि जड़ कर दी थी. सही निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो गई थी.
अन्न ही रक्त का कारक है. अर्जुन के बाणों ने मेरे शरीर से वह रक्त धीरे-धीरे करके निकाल दिया है. अब इस शरीर में सिर्फ गंगापुत्र भीष्म शेष है. सिर्फ माता का अंश है जो सबको निर्मल करती हैं. इसलिए मैं नीति की बातें कर पा रहा हूं.
भीष्म की बात को अटल सत्य समझिए. दुराचार से या किसी को सताकर कमाए गए धन से यदि आप परिवार का पालन करते हैं तो वह परिवार की बुद्धि भ्रष्ट करता है. उससे जो सुख है वह क्षणिक है किंतु लंबे समय में वह दुख का कारण बनता है.
यदि आपके सामने गलत तरीके से पैसा कमाकर भी कोई फल-फूल रहा है तो यह समझिए कि वे उसके पूर्वजन्म के संचित पुण्य हैं जिसे निगल रहा है. जैसे ही वे पुण्य कर्म समाप्त होंगे, उसके दुर्दिन आरंभ होंगे.
भागवत पुराण में कहा गया है- आपके कर्म कई अंश में बंटते हैं. सबसे बड़ा अंश आपकी संतान के अंश में आता है. तो आप अधर्म पर चलकर उसके लिए कांटे बो रहे हैं जिसे आपने अपने रक्त से पैदा किया है. विचारिएगा जरूर.
संकलन प संपादनः प्रभु शरणम्
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