हमारा फेसबुक पेज लाईक करें.[fblike]

झगडा निपटाने के लिए विक्रमादित्य ने एक उपाय सोचा. उन्होंने सोना, चाँदी, कांसा, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लोहा नौ उत्तम धातुओं के नौ आसन बनवाए. सभी आसनों को उनके मूल्य के क्रम में बिछाया गया. जैसे सोने के आसन को सबसे पहले और लोहे के आसन को सबसे पीछे बिछाया गया.

राजा ने सब ग्रहों से अपना-अपना आसन ग्रहण करने को कहा. जिसका आसन सबसे आगे, वह सबसे बड़ा और जिसका आसन सबसे पीछे वह सबसे छोटा. क्योकि लोहा सबसे पीछे था और शनिदेव का आसन था इसलिए शनिदेव ने समझ लिया कि राजा ने मुझे सबसे छोटा बना दिया है.

इसपर शनिदेव बहुत क्रोधित हुए. उन्होंने कहा- राजा तू मुझे नहीं जानता. सूर्य एक राशि पर एक महीना, चन्द्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेढ़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, बुध और शुक्र एक-एक महीने के लिए विचरण करते हैं लेकिन मैं एक राशि पर ढाई वर्ष से लेकर साढ़े सात वर्ष तक रहता हूँ. बड़े बड़े देवताओं को भी मैंने भीषण दुःख दिया है. राजन सुनो! श्रीरामचन्द्रजी को भी साढ़े साती आई और उन्हें वनवास हो गया. रावण पर आई तो राम ने वानरों की सेना लेकर लंका पर चढाई कर दी और रावण के कुल का नाश कर दिया. हे राजन! अब तुम सावधान रहना.

राजा विक्रमादित्य ने कहा- जो भाग्य में होगा, देखा जायेगा. इसके बाद अन्य ग्रह तो प्रसन्नता से अपने अपने स्थान पर चले गए परन्तु शनिदेव नाराज होकर गए.कुछ समय बाद जब विक्रमादित्य पर साढ़े साती की दशा आई तो शनिदेव घोड़ों के सौदागर बनकर अनेक घोड़ो सहित राजा की राजधानी में आए. जब राजा ने घोड़ों के सौदागर के आने की बात सुनी तो अपने अस्तबल की देखभाल करने वाले को अच्छे अच्छे घोड़े खरीदने को कहा. एक अच्छी नस्ल के घोड़े पर मुग्घ होकर राजा उसकी सवारी के लिए चढ़े.

शेष अगले पेज पर. नीचे पेज नंबर पर क्लिक करें.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here