सेवक द्वारा आग का बार-बार ब्योरा सुनकर ऋषिकुमार का ध्यान ब्रह्म उपदेश से हटकर आग की गति पर जा टिका.

उसके सामने जनक ब्रह्म व्याख्या कर रहे थे किंतु वह तो अंदाजा लगा रहा था कि आग कहां तक पहुंची होगी.

थोड़ी देर में सेवक फिर लौटा और घबराते हुए बोला- अब तो आग अतिथिगृह तक पहुंच गई है. इस पहले कि जनक कुछ उत्तर देते ऋषिकुमार खड़ा हुआ और बोला- महाराज मेरी तो लंगोट और धोती टंगी है. उतार लाता हूं, कहीं जल न जाए.

जनक बोले- ऋषिकुमार तुम कहते हो कि संसार के सारे शास्त्र पढ़कर समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है. क्या यही ज्ञान है? इसी के आधार पर संसार को मिथ्या कह रहे हो. तुम्हारा मोह तो खूंटी पर लटके साधारण वस्त्रों से लिपटा है.

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