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उसने अपने मन में निश्चय करके उस पत्थर को ही शिवलिंग मान लिया. बालक ने शुद्ध मन से भक्ति भावपूर्वक गन्ध, धूप, दीप आदि जुटाकर अपने द्वारा रखे शिवलिंग की पूजा की.
बालक उस पर फूल पत्ती चढ़ाता, श्रद्धा भाव से दंड़वत प्रणाम करता. उसका चित्त भगवान के चरणों में आसक्त था. उसी समय ग्वालिन ने भोजन के लिए उसे बुलाया.
शिव की आराधना में लीन उस बालक को भूख-प्यास ही नहीं थी. माता के बार-बार बुलाने पर भी जब वह नहीं आया तो उसकी माता स्वयं वहां आ गईं.
माँ ने पुत्र को एक पत्थर के सामने आंखें मूंदे बैठे देखा तो उसे खींचकर घर ले जाने लगी पर वह हिला तक नहीं. क्रोधित होकर माता ने उसे ख़ूब पीटा. फिर उस पत्थर को उठाकर फेंक दिया.
उस शिवलिंग पर चढ़ाई गई सारी सामग्री को भी फेंककर घर चली गई. बालक के लिए तो वह शिवजी थे. उनका अनादर देखकर वह जोर-जोर से रोने लगा.
बालक बिलखता हुआ महादेव को पुकारने लगा और अचानक अचेत होकर गिर पड़ा. कुछ देर बाद जब चेतना आयी तो भगवान शिव की कृपा से वहां महाकाल का दिव्य मन्दिर खड़ा हो गया था.
मणियों के चमकीले खम्बे उस मन्दिर की शोभा बढा रहे थे. भूतल पर स्फटिक मणि जड़ दी गयी थी. स्वर्ण-शिखर उस शिवालय को सुशोभित कर रहे थे. मुख्य द्वार, उनके कपाट सोने के थे. सामने नीलमणि तथा रत्नजड़ित चबूतरे बने थे.
उस भव्य शिवालय के गर्भगृह में भोलेनाथ का रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित था. उसने जो भी पूजन-सामग्री चढ़ाई थी, वह शिवलिंग पर सुसज्जित पड़ी हुई थी.
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