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सभी बच्चों ने तय किया कि वे अपने अपने योगदान से गुरुजी का जन्मोत्सव मनाएंगे. यहीं पर भोजन बनाया जाएगा. कृष्णा ने गोपाल भैया को भी जन्मोत्त्सव की बात बताई. भगवान ने भी कृष्णा के उत्साह को देखकर खुशी जताई.

कृष्णा ने दादी से उत्सव के लिए पैसे या कुछ सामान देने की बात कही तो दादी ने बता दिया कि उनके पास कुछ भी नहीं है जो दे सकें. आस-पड़ोस की दया से तो दोनों पल रहे हैं.

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अगले दिन कृष्णा भारी मन से विद्यालय को चला. वह जाना नहीं चाहता था लेकिन जन्मोत्सव में पहुंचना जरूरी था. रास्ते में गोपाल भैया मिले लेकिन उन्हें देखकर कृष्णा ने रोज की तरह कोई खुशी नहीं जाहिर की.

भगवान से कुछ भी छुपा हुआ नहीं था.

उन्होंने भोले बनकर कृष्णा से पूछा- छोटे भैया तुम दुखी क्यों हो तो कृष्णा ने अपनी गरीबी की व्यथा सुनाई. आंखों में आंसू भर आए. भगवान से देखा नहीं गया.

उन्होंने एक छोटी सी मिट्टी की लुटिया में दूध भरा और गोपाल को दे दिया. गोपाल खुश हो गया कि चलो आखिर उसके पास कोई न कोई उपहार तो है. आखिर उसे खाली हाथ तो विद्यालय नहीं जाना पड़ेगा.

गुरुजी की पत्नी को दूध की लुटिया दे दी. इतनी छोटी लुटिया में दूध देखकर हंसी.

गुरुपत्नी ने दूध की लुटिया एक तरफ रख दी थी और बाकी के कामों में फंसकर उसके बारे में भूल गई थीं.

कृष्णा जानना चाह रहा था कि उसके उपहार का क्या इस्तेमाल किया जा रहा है. इसलिए वह बार-बार झांककर देखता कि दूूध कहां रखा है. क्या इसे गुरूजी पीएंगे या किसी और काम में आएगा. गुरुमाता से भोलेपन में उसने यह बात कई बार पूछ भी ली.

इससे नाराज होकर गुरुपत्नी ने दूध की लुटिया उठाई और खीर के बर्तन में पलट दी. सोचा कि लुटिया अभी खाली हो जाएगी तो उठाकर दूर फेंक दूंगी.

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कृष्णा को भी ये संतोष हो जाएगा कि उसकी दूध की लुटिया का इस्तेमाल खीर बनाने में हो गया है लेकिन ये क्या! लुटिया में भरा हुआ दूध खाली ही नहीं हो रहा था.

गुरुपत्नी ने घबराहट में चीखकर गुरुजी को बुलाया. वह अपने सभी शिष्यों के साथ आए.

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