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उन्होंने श्रीकृष्णलीला का एक श्लोक बनाया और उसका आधा भाग शिष्यों को रटाकर उधर भेज दिया जिधर शुक ध्यान लगाते थे.

एक दिन शुकदेवजी ने भी वह श्लोक सुना. उस श्लोक को सुनकर वह मुग्ध हो गए. उन्हें पूरी कथा सुनने की बड़ी तेज लालसा उत्पन्न हुई. पुनः व्यासजी के शिष्य आए और एक नया श्लोक आधा सुना दिया.

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अब तो शुकदेव पूरी कथा सुनने का लोभ रोक ही न कर पाए. वह श्रीकृष्ण लीला के आकर्षण में खींचे सीधे अपने पिता के आश्रम तक चले आए.

इससे व्यासजी बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने अपने पुत्र शुकदेव को श्रीमद्भागवत का विधिवत ज्ञान दिया. शुक भागवत में पारंगत हो गए. शुकदेव ने इसी भागवत का ज्ञान राजा परीक्षित को दिया था. जिसके दिव्य प्रभाव से परीक्षित ने मृत्यु के भय को जीत लिया.

शुकदेव जी ने जो कथा परीक्षित को सुनाई उससे उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ. वह मोह-माया के बंधन से छूट गए. शरीर और आत्मा के संयोग और वियोग का क्या दर्शन है इसका सुंदर वर्णन श्रीमद् भागवत में है.

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भागवत पुराण को महापुराण माना जाता है. इसमें कथाओं के माध्यम से उत्कृष्ट ज्ञान प्रदान किया गया है. भागवत में एक बड़ा ही ज्ञान वाला प्रसंग है भगवान कपिल और उनकी माता देवहूति के बीच की एक चर्चा. इसे ध्यान से समझिएगा.

माता को पता  चला है कि उनका पुत्र कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि स्वयं श्रीहरि का अवतार हैं. अब माता देवहूति उन्हें पुत्र माने या गुरू माने इसी उलझन में हैं.

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1 COMMENT

  1. Mujha bhut khusi h ki Jo hmari sanskriti hmara ved puran lupt hota ja RHA h aur Jo hmara snatan dharm k h vo bhi apna dharmik grantho PR dhyan nhi d rhe h. Kintu Prabhusarnam app k nirmata aur unki sari team ka shraho.ya s dhnyabad deta hu. Aur prabhu s kamna krta hu ki aaga aur future m bhi dino din trakki kra. Jay ho.

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